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History of India
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वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित आज़ाद हिंद फौज (INA) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के कई हिस्सों में 'समांतर सरकारों' (Parallel Governments) की स्थापना हुई, जिनमें बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में, तामलुक में 'जातीय सरकार' और सतारा में 'प्रति सरकार' (वाई बी चव्हाण और नाना पाटिल के नेतृत्व में) सबसे लंबे समय तक चलने वाली सरकारें थीं।
- 2. सुभाष चंद्र बोस ने जनवरी 1941 में कलकत्ता से ब्रिटिश नजरबंदी से चुपचाप निकलकर जर्मनी पहुँचे और वहाँ उन्होंने बर्लिन रेडियो से भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में प्रसारण किया तथा वहीं जर्मन सैन्य सहायता से 'इंडियन लीजन' (फ्री इंडिया सेंटर) की स्थापना की।
- 3. सिंगापुर के पतन के पश्चात रास बिहारी बोस ने जापान के सहयोग से 'इंडियन इंडिपेंडेंस लीग' और 'आज़ाद हिंद फौज' का गठन किया, किंतु मोहन सिंह के साथ जापानी सैन्य अधिकारियों के मतभेदों के कारण आईएनए का पहला चरण असफल हो गया, जिसे बाद में पुनर्जीवित करने के लिए सुभाष चंद्र बोस को वर्ष 1943 में सिंगापुर आमंत्रित किया गया था।
- 4. आजाद हिंद फौज की 'रानी झांसी रेजिमेंट' की कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल के हाथों में थी, और यह पूरी तरह से महिलाओं की एक समर्पित युद्धक रेजिमेंट थी, जिसने ब्रिटिश सेना के खिलाफ बर्मा और इम्फाल मोर्चे पर सक्रिय सैन्य कार्रवाई में भाग लिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए सभी कथन पूर्णतः सत्य हैं। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के विभिन्न भागों में समानांतर सरकारों का गठन किया गया था, जिनमें सतारा की 'प्रति सरकार' सबसे लंबी अवधि तक चली। सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी में 'फ्री इंडिया सेंटर' और 'इंडियन लीजन' की स्थापना की थी। इसके बाद रास बिहारी बोस के निमंत्रण पर वे सिंगापुर पहुँचे और 'आज़ाद हिंद फौज' (INA) का पुनर्गठन किया, जिसकी महिला रेजिमेंट 'रानी झांसी रेजिमेंट' का नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया था। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ पढ़ सकते हैं।
Related Questions
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनकी संस्थागत व्यवस्थाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध धर्म के 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (Dependent Origination) का सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि प्रत्येक घटना और वस्तु किसी न किसी कारण से उत्पन्न होती है और यह शाश्वत ब्रह्म या आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार किए बिना संसार के संचालन की व्याख्या करता है, जबकि जैन धर्म का 'स्यादवाद' (सप्तभंगी नय) ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है जो यह बताता है कि प्रत्येक सत्य दृष्टिकोण विशेष के अनुसार आंशिक होता है।
2. बौद्ध संघ में प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु सीमा пятнадцать (15) वर्ष निर्धारित की गई थी, और संघ में किसी भी प्रकार के ऋणग्रस्त, चोर, दास, या राजकर्मचारी को प्रवेश की पूर्ण अनुमति थी ताकि सामाजिक समानता स्थापित की जा सके।
3. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुसार स्त्रियाँ मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम हैं और उनके 19वें तीर्थंकर 'मल्लिनाथ' एक स्त्री थीं, जबकि दिगंबर संप्रदाय इस मान्यता का पूर्ण खंडन करता है और यह मानता है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए नग्नता अनिवार्य है और स्त्री शरीर से मुक्ति संभव नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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तुगलक वंश के पतन का सबसे प्रमुख कारण क्या था?
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मध्यकालीन भारत के सूफी संतों और उनके सिलसिलों (संप्रदायों) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में चिश्ती सिलसिले की स्थापना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में की थी, और इस सिलसिले के संतों ने संगीत (समां) को ईश्वर की प्राप्ति का साधन माना तथा राजकीय संरक्षण और शाही दरबारों से दूरी बनाए रखी।
2. सुहरावर्दी सिलसिला मुख्य रूप से मुल्तान और सिंध के क्षेत्रों में अधिक प्रभावशाली था, और इस सिलसिले के संतों (जैसे बहाउद्दीन जकारिया) ने राज्य से किसी प्रकार का अनुदान या वित्तीय सहायता लेने से स्पष्ट इंकार कर दिया था तथा पूरी तरह वैराग्य जीवन अपनाया था।
3. कादिरिया सिलसिले की स्थापना भारत में शाह नेमतुल्लाह द्वारा की गई थी, और इस सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत मियांदिर थे, जिन्हें मुगल राजकुमार दारा शिकोह का आध्यात्मिक गुरु माना जाता है।
4. नक्शबंदी सिलसिला रूढ़िवादी और कट्टरपंथी विचारधारा के लिए जाना जाता था, जिसके प्रमुख संत ख्वाजा बाकी بالله और शेख अहमद सरहिंदी थे, जिन्होंने अकबर की 'दीन-ए-इलाही' और धार्मिक उदारवादी नीतियों का पुरजोर विरोध किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लॉर्ड डलहौजी द्वारा लागू की गई 'व्यपगत का सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) नीति के तहत सतारा, नागपुर और झांसी जैसी रियासतों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय किया गया, जिससे भारतीय शासक वर्ग और उनके आश्रितों में गहरी राजनीतिक असुरक्षा और असंतोष उत्पन्न हुआ।
2. ब्रिटिश सरकार द्वारा 1856 में अवध का अधिग्रहण 'कुशासन' (Misgovernance) के आधार पर किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप अवध के हजारों सिपाही, जो ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे, आहत हुए और इस कार्रवाई को उन्होंने अपनी मातृभूमि के साथ विश्वासघात माना।
3. वर्ष 1850 में पारित 'धार्मिक अयोग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) के तहत पैतृक संपत्ति से वंचित करने के पुराने हिंदू कानून में संशोधन किया गया, जिसके अनुसार ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को उसके पूर्वजों की संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा; इसे रूढ़िवादी भारतीय समाज ने धर्म परिवर्तन का षड्यंत्र माना।
4. अंग्रेजों द्वारा भू-राजस्व की नई प्रणालियाँ (जैसे रैयतवाड़ी और महालवाड़ी) लागू किए जाने से पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई, जिसके कारण कृषक वर्ग और पारंपरिक हस्तशिल्पकार साहूकारों तथा ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के चंगुल में फंसकर पूरी तरह बर्बाद हो गए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के पुनरुत्थान, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) और तद्नंतर उत्पन्न राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गांधी-इरविन समझौते के तहत ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान हिंसा के आरोपियों को छोड़कर सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने और जब्त की गई संपत्ति को वापस करने की शर्त स्वीकार की थी, किंतु भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी को माफ करने की गांधीजी की मांग को औपचारिक रूप से अस्वीकार कर दिया गया था।
2. लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने वाले महात्मा गांधी ने सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे और अछूतों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग का पुरजोर समर्थन किया, जिससे डॉ. बी.आर. अंबेडकर के साथ उनका ऐतिहासिक समझौता हुआ।
3. वर्ष 1932 में जब गांधीजी ने भारत लौटने के पश्चात पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया, तब नए वाइसराय लॉर्ड विलिंगडन ने अत्यधिक दमनकारी नीतियां अपनाते हुए कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और दमनकारी अध्यादेशों के माध्यम से आंदोलन को कुचल दिया।
4. ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड द्वारा घोषित 'कम्युनल अवार्ड' (सांप्रदायिक पंचांग) के विरोध में महात्मा गांधी ने येरवडा जेल में आमरण अनशन किया, जिसके परिणामस्वरुप पूना समझौता संपन्न हुआ और दलितों के लिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में सीटों की संख्या को बढ़ाया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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