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History of India
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों (ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज आदि) के वैचारिक संस्थापकों, दार्शनिक मान्यताओं और उनके सुधारवादी कार्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने एकेश्वरवाद का समर्थन किया और वेदों की अचूकता या infallibility के सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं किया, तथा समाज ने बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध तीव्र वैधानिक संघर्ष किया।
  2. 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और वेदों को अपौरुषेय एवं समस्त ज्ञान का स्रोत माना, किंतु उन्होंने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद और जन्मजात जाति व्यवस्था का पूर्णतः समर्थन किया।
  3. 3. बंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा स्थापित 'प्रार्थना समाज' ने मुख्य रूप से अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा और दलित उद्धार को बढ़ावा दिया, तथा महादेव गोविंद रानाडे (एम.जी. रानाडे) ने 'भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन' के माध्यम से इन सुधारों को अखिल भारतीय रूप दिया।
  4. 4. स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1897 में 'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की, जिसका उद्देश्य केवल धार्मिक पुनरुत्थान था, और उन्होंने वेदों के प्राचीन कर्मकांडों को ही आधुनिक भारतीय समाज की मुक्ति का एकमात्र साधन बताया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज ने एकेश्वरवाद पर बल दिया, वेदों की अचूकता को अस्वीकार किया और सती प्रथा व बाल विवाह का कड़ा विरोध किया। कथन 2 गलत है क्योंकि आर्य समाज ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद और जन्मजात जाति व्यवस्था का कड़ा विरोध किया था, समर्थन नहीं। कथन 3 सही है क्योंकि प्रार्थना समाज की स्थापना बंबई में हुई थी और इसने अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह तथा महिला शिक्षा पर जोर दिया, जिसे एम.जी. रानाडे ने राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया। विकिपीडिया संदर्भ के अनुसार ब्रह्म समाज और अन्य सुधार आंदोलनों ने भारतीय पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कथन 4 गलत है क्योंकि रामकृष्ण मिशन का उद्देश्य केवल धार्मिक पुनरुत्थान नहीं बल्कि सामाजिक सेवा और मानवता का कल्याण था, और विवेकानंद ने कर्मकांडों के बजाय वेदांत के व्यावहारिक स्वरूप पर बल दिया था।
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