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History of India
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भक्ति और सूफी आंदोलन के दार्शनिक स्वरूप, संतों एवं उनके सिद्धांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. दक्षिण भारत के अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी थी, तथा इनमें 'आलवार' संतों की कुल संख्या बारह और 'नयनार' संतों की संख्या त्रेसठ मानी जाती है, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से जातिगत ऊँच-नीच का कड़ा विरोध किया।
  2. 2. वल्लभाचार्य ने 'शुद्धद्वैतवाद' (Pure Non-dualism) के दर्शन का प्रतिपादन किया और पुष्टि मार्ग की स्थापना की, जिसके अंतर्गत भगवान कृष्ण की बाल रूप में अनन्य भक्ति पर विशेष बल दिया गया।
  3. 3. सूफी संत मियाॅं मीर, जो कादिरिया सिलसिले से संबंधित थे, ने लाहौर में प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) की नींव रखी थी, तथा वे सिख गुरु अर्जुन देव के समकालीन और आध्यात्मिक मित्र थे।
  4. 4. मध्यकालीन संत कबीर और नानक दोनों ने ही निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल दिया और मूर्तिपूजा, बाह्य आडंबरों, तथा तीर्थयात्राओं का जोरदार खंडन किया, किंतु कबीर ने अपने उपदेशों के लिए फारसी भाषा को माध्यम बनाया जबकि गुरु नानक ने केवल अरबी भाषा का प्रयोग किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 3 सही हैं। दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने में अलवार (वैष्णव) और नयनार (शैव) संतों की ऐतिहासिक भूमिका रही है। आलवार संतों की संख्या 12 और नयनार संतों की संख्या 63 थी। वल्लभाचार्य ने 'शुद्धद्वैतवाद' का दर्शन दिया और पुष्टिमार्ग के माध्यम से कृष्ण भक्ति को बढ़ावा दिया। कादिरिया सिलसिले के संत मियाॅं मीर ने सिखों के पाँचवें गुरु अर्जुन देव के अनुरोध पर अमृतसर स्थित हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखी थी।कथन 4 गलत है क्योंकि कबीर ने अपनी बात समझाने के लिए आम बोलचाल की सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा (हिंदी के विविध रूप) का प्रयोग किया था, न कि फारसी का; इसी प्रकार गुरु नानक देव ने भी अपनी वाणी के लिए गुरुमुखी और स्थानीय भाषाओं का व्यापक प्रयोग किया था, न कि केवल अरबी का। विकिपीडिया संदर्भ
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