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History of India
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गुप्त काल एवं मौर्योत्तर काल के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, नगरों के पतन और भूमि अनुदान (Land Grants) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. गुप्त काल में कृषि भूमि के क्रय-विक्रय और हस्तांतरण के दस्तावेजों का पंजीयन करने वाले प्रमुख अधिकारी को 'पुस्तकपाल' कहा जाता था, जो ज़िलों (विषय) के स्तर पर प्रशासनिक अभिलेखों का रख-रखाव करता था।
  2. 2. सातवाहन काल से आरंभ हुई कर-मुक्त भूमि अनुदान (Agrahara) देने की प्रथा का गुप्त काल में अत्यधिक विस्तार हुआ, जिससे स्थानीय स्तर पर स्वायत्त प्रशासनिक केंद्रों का उदय हुआ और मौद्रिक अर्थव्यवस्था में क्रमिक संकुचन (Monetary contraction) देखने को मिला।
  3. 3. गुप्तोत्तर काल और पतनशील गुप्त काल के आते-आते उत्तरी और मध्य भारत के कई बड़े नगरों (जैसे हस्तिनापुर, कौशाम्बी और पाटलिपुत्र) की जनसंख्या में भारी गिरावट आई और उनकी नगरीय विशेषताएँ क्षीण होने लगीं, जिसे इतिहासकार 'नगरीय क्षय' (Urban Decay) की संज्ञा देते हैं।
  4. 4. गुप्त साम्राज्य के दौरान 'अक्षपटलिक' नामक अधिकारी का मुख्य कार्य राजकीय टकसाल (Mint) का संचालन करना और सिक्कों की शुद्धता की जाँच करना था, और इसका कृषि भूमि के लेखा-जोखा से कोई संबंध नहीं था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

गुप्त काल एवं मौर्योत्तर काल में प्रशासनिक व्यवस्था और आर्थिक संरचना में बड़े बदलाव आए। कथन 1, 2 और 3 पूर्णतः सत्य हैं। 'पुस्तकपाल' नामक अधिकारी ज़िले (विषय) के स्तर पर भूमि के क्रय-विक्रय, स्वामित्व और हस्तांतरण के दस्तावेजों के पंजीकरण का कार्य करता था। सातवाहन काल से शुरू हुई ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान देने की प्रथा गुप्त काल में अपने चरम पर पहुँची, जिससे सामंती प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिला और स्वर्ण सिक्कों के बावजूद सामान्य लेन-देन में धातु मुद्रा का संकुचन दिखा। इसके अलावा, विदेशी व्यापार में ह्रास के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में 'नगरीय क्षय' (Urban Decay) की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। कथन 4 असत्य है क्योंकि 'अक्षपटलिक' राजकीय अभिलेखों, दस्तावेजों और भूमि के लेखा-जोखा का अधिकारी होता था, न कि केवल टकसाल का। विकिपीडिया संदर्भ
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