त्वरित लिंक्स
History of India
2 views
1857 के महान विद्रोह के स्वरूप और प्रकृति के संबंध में विभिन्न इतिहासकारों के प्रसिद्ध कथनों और पुस्तकों के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
- 1. एस.एन. सेन (Surendranath Sen) - "यह तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न तो पहला, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।"
- 2. बेंजामिन डिजरायली (Benjamin Disraeli) - "यह केवल एक सिपाही विद्रोह नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय विद्रोह था।"
- 3. वी.डी. सावरकर (V.D. Savarkar) - "यह 1857 का विद्रोह एक सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम था।"
- 4. टी.आर. होम्स (T.R. Holmes) - "यह बर्बरता और सभ्यता के बीच का युद्ध था।
" उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से युग्म सही सुमेलित हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
1857 के विद्रोह की प्रकृति को लेकर अलग-अलग इतिहासकारों और विचारकों ने अपने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। यहाँ दिए गए विकल्पों में से युग्म 2, 3 और 4 सही हैं, जबकि युग्म 1 का कथन गलत है।
- प्रथम कथन में उल्लिखित प्रसिद्ध पंक्ति—"यह तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न तो पहला, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था"—आर.सी. मजूमदार (R.C. Majumdar) द्वारा अपनी पुस्तक 'द सिपाही म्यूटिनी एंड द रिबेलियन ऑफ 1857' में कही गई थी, न कि एस.एन. सेन द्वारा। एस.एन. सेन की आधिकारिक पुस्तक 'सेंचुरीज़ (Eighteen Fifty-Seven)' थी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि "यह तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न तो प्रथम, न राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था" वाली बात मजूमदार की थी, जबकि सेन का निष्कर्ष थोड़ा अलग था।
- ब्रिटिश राजनेता बेंजामिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में दिए गए अपने भाषण में इसे 'राष्ट्रीय विद्रोह' (National Revolt) कहा था।
- विनायक दामोदर सावरकर (V.D. Savarkar) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' में इसे सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के रूप में चित्रित किया।
- इतिहासकार टी.आर. होम्स ने इस विद्रोह को "बर्बरता और सभ्यता के बीच का संघर्ष" (Conflict between civilization and barbarism) करार दिया था।
विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
→
प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में बौद्ध धर्म और जैन धर्म की दार्शनिक मान्यताओं, संघ की व्यवस्थाओं तथा उनके प्रसार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध धर्म के विपरीत, जैन धर्म ने आत्मा (जीव) के अस्तित्व को स्वीकार किया और मोक्ष प्राप्ति के लिए 'कंटकशोधन' के मार्ग का अनुसरण करते हुए शरीर को अत्यंत कष्ट देने (संलेखना या कायाक्लेश) पर विशेष बल दिया था।
2. बौद्ध संघ की सदस्यता के लिए वर्ण व्यवस्था को अनिवार्य रूप से स्वीकार करना पड़ता था, जबकि जैन संघ में प्रवेश के लिए सभी जातियों और वर्गों के द्वार खुले थे, किंतु महिलाओं को जैन संघ में दीक्षा देने का प्रावधान महावीर स्वामी ने अपने जीवनकाल में वर्जित कर दिया था।
3. बौद्ध धर्म के त्रिरत्न—बुद्ध, धम्म और संघ हैं, जबकि जैन धर्म के त्रिरत्न—सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र हैं, जिन्हें जैन दर्शन में मोक्ष का वास्तविक मार्ग कहा गया है।
4. जैन धर्म के 'स्यादवाद' (सप्तभंगी नय) का सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि ज्ञान सापेक्ष होता है और प्रत्येक वस्तु के अनेक पहलू (अनेकांतवाद) होते हैं, जिसे पूर्ण रूप से जानना एक साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल और गरम दल के वैचारिक संघर्ष तथा सूरत विभाजन (1907) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन, जिसकी अध्यक्षता गोपाल कृष्ण गोखले ने की थी, में उग्रवादी दल के तीव्र दबाव के कारण ब्रिटिश वस्तुओं और संस्थाओं के बहिष्कार का प्रस्ताव कलकत्ता से बाहर पूरे देश में लागू करने का औपचारिक और सर्वसम्मत निर्णय ले लिया गया था।
2. वर्ष 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस के मंच से पहली बार दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में 'स्वराज' (Swaraj) को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में घोषित किया गया, किंतु बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रस्तावों पर नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच गंभीर गतिरोध उत्पन्न हो गया था।
3. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के विभाजन का मुख्य तात्कालिक कारण रासबिहारी घोष की अध्यक्षता को लेकर नहीं, बल्कि इस बात पर था कि गरम दल के नेता लाला लाजपत राय को कांग्रेस का अगला अध्यक्ष बनाने की मांग को नरमपंथियों ने पूरी तरह ठुकरा दिया था।
4. सूरत विभाजन के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने गरमपंथी नेतृत्व का पूर्ण दमन करने की नीति अपनाई, जिसके तहत बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर छह वर्ष के कारावास के लिए मांडले (बर्मा) जेल भेज दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान दिल्ली में बागियों के नेतृत्व, मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की स्थिति तथा प्रशासनिक और सैन्य संचालन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मेरठ के विद्रोही सिपाहियों के 11 मई 1857 को दिल्ली पहुँचने के बाद, अनिच्छुक मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को सैनिकों द्वारा औपचारिक रूप से 'हिन्दुस्तान का शहंशाह' घोषित किया गया, किंतु जफर ने इस पद को स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया था और वे पूरी तरह अंग्रेजों के प्रति वफादार बने रहे।
2. दिल्ली में विद्रोह की वास्तविक सैन्य कमान और प्रशासनिक नियंत्रण एक 'कोर्ट ऑफ सोल्जर्स' (सैनिकों की अदालत) के हाथों में था, जिसमें विभिन्न रेजीममेंट्स से आए चुने हुए सिपाही और अधिकारी शामिल थे, और सम्राट की स्थिति केवल एक प्रतीकात्मक प्रमुख जैसी थी।
3. ब्रिटिश सेना ने जॉन निकलसन और हडसन के नेतृत्व में दिल्ली पर पुन: अधिकार करने के लिए कड़ा संघर्ष किया, जिसके दौरान हुमायूं के मकबरे में छिपे बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके पुत्रों की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
4. दिल्ली के पतन के उपरांत ब्रिटिश सरकार द्वारा मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें निर्वासित करके रंगून (बर्मा) भेज दिया गया, जहाँ वर्ष 1862 में उनका निधन हो गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान कानपुर में नाना साहब, तात्या टोपे और अजीमुल्ला खां की भूमिका तथा उससे जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ने किया था, जिन्होंने स्वयं को पेशवा घोषित कर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी, तथा उनके मुख्य सलाहकार और सचिव अजीमुल्ला खां ने इस विद्रोह के कूटनीतिक और राजनीतिक संपर्कों को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
2. तात्या टोपे, जो नाना साहब के अत्यंत विश्वासपात्र और सैन्य कमांडर थे, ने कानपुर की सेना का प्रभावी सैन्य नेतृत्व किया और बाद में जनरल ह्यूरोज़ की सेना से पराजित होने के पश्चात रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर कालपी और ग्वालियर के मोर्चे पर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का संचालन किया।
3. कानपुर में आत्मसमर्पण करने वाले ब्रिटिश सैनिकों और नागरिकों को सुरक्षित इलाहाबाद भेजने के लिए नाना साहब द्वारा 'सतीचौरा घाट' पर नावों की व्यवस्था की गई थी, किंतु वहाँ हुई हिंसक झड़प और गोलीबारी के परिणामस्वरूप उत्पन्न नरसंहार की घटना के लिए नाना साहब की सीधी योजना और आदेश उत्तरदायी थे, जिसकी पुष्टि समकालीन ब्रिटिश दस्तावेजों से होती है।
4. विद्रोह के दमन के पश्चात ब्रिटिश जनरल कैंपबेल ने कानपुर पर पुनः अधिकार कर लिया, जिसके बाद नाना साहब नेपाल की तराई की ओर निकल गए और उनका अंतिम वास्तविक भविष्य व ठिकाना आज तक इतिहास में एक रहस्य बना हुआ है, जबकि तात्या टोपे को अंग्रेजों द्वारा ग्वालियर के पतन के तुरंत बाद गिरफ्तार कर फाँसी दे दी गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के उदय से पूर्व ब्रिटिश शासन की नीतियों (राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत सिद्धांत' (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) नीति के तहत सतara, जैतपुर, संबलपुर, उदयपुर, नागपुर और झांसी का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय किया गया था, जिससे देशी रियासतों और उत्तराधिकार से वंचित होने वाले शासकों में गंभीर असंतोष उत्पन्न हुआ।
2. ब्रिटिश प्रशासन द्वारा वर्ष 1850 में पारित 'धार्मिक अयोग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले व्यक्ति को अपने पैतृक पूर्वजों की संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा, जिसे पारंपरिक भारतीयों ने धर्म-परिवर्तन को बढ़ावा देने का षड्यंत्र माना।
3. आर्थिक क्षेत्र में, अंग्रेजों की एकतरफा मुक्त व्यापार नीति (Free Trade Policy) और भारी आयात शुल्कों ने पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को पूरी तरह तबाह कर दिया, जिससे लाखों कारीगर और बुनकर बेरोजगार होकर कृषि भूमि पर निर्भर होने के लिए बाध्य हो गए।
4. लॉर्ड कैनिंग के कार्यकाल में वर्ष 1856 में पारित 'सामान्य सेवा enlistment अधिनियम' (General Service Enlistment Act) के तहत नए भारतीय सैनिकों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया कि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें समुद्र पार करके विदेशों में भी युद्ध लड़ने जाना होगा, जिसे तत्कालीन रूढ़िवादी भारतीय समाज में समुद्र पार यात्रा करने पर जाति-भ्रष्ट होने की धार्मिक मान्यता के विरुद्ध देखा गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.