BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

History of India
3 views

मौर्य साम्राज्य के प्रांतीय प्रशासन, न्याय प्रणाली और आर्थिक नियंत्रण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. अशोक के प्रमुख शिलालेखों और यूनानी विवरणों के अनुसार, मौर्य साम्राज्य पाँच प्रमुख प्रांतों में विभाजित था, जिनकी राजधानियाँ तक्षशिला, उज्जैन, सुवर्णगिरि, तोसली और पाटलिपुत्र थीं, तथा इन प्रांतों का प्रशासन शाही परिवार के राजकुमारों (जिन्हें 'कुमार' या 'आर्यपुत्र' कहा जाता था) द्वारा संचालित किया जाता था।
  2. 2. मौर्यकालीन न्याय व्यवस्था में दीवानी मामलों के न्यायालयों को 'धर्मस्थीय' कहा जाता था जो व्यावहारिक कानूनों से संबंधित थे, जबकि फौजदारी मामलों (कानून और व्यवस्था या चोरी-डकैती) के न्यायालयों को 'कंटकशोधन' कहा जाता था, जिसके मुख्य न्यायाधीश 'प्रदेशाष्ट्र' कहलाते थे।
  3. 3. कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के अनुसार, राज्य द्वारा खानों, वस्त्रों, मदिरा और हथियारों के उत्पादन पर एकाधिकार रखा जाता था, तथा विदेशी व्यापारियों के आवागमन व गतिविधियों की अधिकृत निगरानी के लिए 'अतिथियों' (विदेशी पर्यटकों/व्यापारियों) के लिए एक अलग विभाग की व्यवस्था थी।
  4. 4. अशोक के अपने धम्म महामात्रों की नियुक्ति के माध्यम से समाज में नैतिक संहिता को बढ़ावा दिया गया, किंतु उनके 'स्तंभ लेख IV' से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने न्याय प्रशासन में एकरूपता लाते हुए मृत्युदंड प्राप्त कैदियों को क्षमादान देने या उनकी सजा माफ करने के लिए तीन दिन का अतिरिक्त 'जीवन-दान' अवकाश प्रदान किया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

दिए गए सभी कथन मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक, न्यायिक और आर्थिक व्यवस्था के संबंध में पूर्णतः सत्य हैं। मौर्य साम्राज्य पाँच प्रांतों (उत्तरापथ, अवंतीराष्ट्र, दक्षिणापथ, कलिंग और प्राच/मध्यदेश) में बंटा था। दीवानी न्यायालय 'धर्मस्थीय' और फौजदारी न्यायालय 'कंटकशोधन' कहलाते थे। अर्थशास्त्र में राज्य-नियंत्रित उद्योगों और विदेशी यात्रियों के पंजीकरण का विस्तृत उल्लेख मिलता है। अशोक के स्तंभ लेख IV के अनुसार, मृत्युदंड प्राप्त कैदियों के परिजनों को अपील करने या दया याचिका के लिए तीन दिन का 'जीवन-दान' दिया जाता था। इस विषय के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Share:

Related Questions

शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित "रुपया" और "दाम" का अनुपात क्या था? चंपारण सत्याग्रह (1917) और खेड़ा सत्याग्रह (1918) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. चंपारण सत्याग्रह के दौरान राजकुमार शुक्ल के आमंत्रण पर महात्मा गांधी जब बिहार पहुँचे, तब यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा किसानों पर लागू की जाने वाली 'तीनकथा प्रणाली' (जहाँ कुल भूमि के 3/20 भाग पर नील की खेती करना अनिवार्य था) के विरुद्ध एक तीव्र कानूनी और जन आंदोलन चलाया गया, जिसके दबाव में सरकार को 'चंपारण कृषि अधिनियम' (Champaran Agrarian Act) पारित करना पड़ा। 2. खेड़ा सत्याग्रह (गुजरात) के दौरान फसल खराब होने के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन द्वारा लगान वसूली माफ न किए जाने पर महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल ने किसानों को लगान न देने का 'no-rent campaign' (कर नहीं आंदोलन) चलाने का सफल नेतृत्व किया, जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने केवल उन्हीं किसानों से लगान वसूलने का आदेश दिया जो भुगतान करने में सक्षम थे। 3. वर्ष 1918 में ही अहमदाबाद मिल हड़ताल के दौरान महात्मा गांधी ने पहली बार भारत में सुनियोजित रूप से भूख हड़ताल (Hunger Strike) का अस्त्र प्रयोग किया, जिसका कारण मिल मालिकों द्वारा 'प्लेग बोनस' (Plague Bonus) को समाप्त करना और मजदूरों की माँगों को ठुकरा देना था। 4. चंपारण सत्याग्रह के तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित 'चंपारण जाँच समिति' (Champaran Agrarian Committee) में महात्मा गांधी को भी एक सदस्य के रूप में शामिल किया गया था, और इस समिति की सर्वसम्मत रिपोर्ट के आधार पर अवैध रूप से वसूले गए धन का 50 प्रतिशत हिस्सा किसानों को वापस लौटाने का प्रावधान किया गया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? किस मुगल सम्राट ने मनसबदारों के वेतन में से "खुराक-ए-दाव" (पशुओं के चारे का खर्च) काटने की शुरुआत की थी? वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान कानपुर में नाना साहब, तात्या टोपे और अजीमुल्ला खां की भूमिका तथा उससे जुड़े सैन्य एवं रणनीतिक घटनाक्रमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. नाना साहब ने कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व संभालते हुए स्वयं को पेशवा घोषित किया तथा पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र के रूप में अंग्रेजों द्वारा उनकी पेंशन रोके जाने और डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स (राज्य हड़प नीति) के तहत उपाधियों के अस्वीकार किए जाने के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का आह्वान किया। 2. अजीमुल्ला खां, जो नाना साहब के मुख्य सलाहकार और कूटनीतिक रणनीतिकार थे, ने विद्रोह से पूर्व लंदन जाकर नाना साहब की पेंशन के मामले की पैरवी की थी और क्रीमिया युद्ध के दौरान ब्रिटिश सैन्य कमजोरियों का प्रत्यक्ष अवलोकन कर भारतीय विद्रोह की योजना को वैचारिक आधार दिया था। 3. कानपुर में ब्रिटिश समर्पण के पश्चात जनरल नील द्वारा भारतीय नागरिकों और कैदियों पर ढाए गए अमानवीय अत्याचारों के प्रतिकार के रूप में 'बीबीघर नरसंहार' की घटना घटी, जिसके उपरांत तात्या टोपे ने कानपुर की रक्षा में असफल होने पर रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर ग्वालियर और कालपी के मोर्चे पर ब्रिटिश सेना के खिलाफ अत्यंत कुशल गोरिल्ला युद्ध का संचालन किया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल (Moderate) और गरम दल (Extremist) के कालखंड तथा उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. प्रारंभिक कांग्रेस के नेताओं (जैसे दादाभाई नौरोजी और गोपाल कृष्ण गोखले) की ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट आस्था थी और वे अपनी मांगों को मनवाने के लिए 'प्रार्थना, याचिका और विरोध' (Prayer, Petition and Protest) की संवैधानिक पद्धति में विश्वास रखते थे। 2. वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात कांग्रेस के भीतर उग्रवादी (गरम दल) विचारधारा का तीव्र विकास हुआ, जिसके प्रमुख नेताओं—लाल, बाल और पाल—ने ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा को राजनीतिक संघर्ष का मुख्य हथियार बनाया। 3. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच वैचारिक व रणनीतिक मतभेदों के कारण हुआ था, तथा इस अधिवेशन में गरम दल के नेताओं ने अंग्रेजों के साथ पूर्ण असहयोग और सशस्त्र क्रांति का औपचारिक प्रस्ताव पारित करवा लिया था। 4. उग्रवादी नेताओं का यह मानना था कि स्वशासन (Home Rule) या स्वराज्य ही राजनीतिक मुक्ति का एकमात्र मार्ग है, और इसके लिए जनता की सक्रिय राजनीतिक भागीदारी और संघर्ष आवश्यक है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.