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History of India
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान झाँसी और ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के सैन्य अभियानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. मार्च 1858 में ब्रिटिश जनरल सर ह्यूरोज (Sir Hugh Rose) की सेना द्वारा झाँसी के किले की घेराबंदी किए जाने पर रानी लक्ष्मीबाई ने अत्यंत वीरता के साथ रक्षा की, और किले के पतन के पश्चात तात्या टोपे की संयुक्त सेना से मिलने के लिए कालपी की ओर प्रस्थान किया।
  2. 2. कालपी की पराजय के पश्चात रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने ग्वालियर की ओर कूच किया तथा वहाँ के सिंधिया शासक जयाजीराव सिंधिया को पराजित कर ग्वालियर के किले पर अधिकार कर लिया, जहाँ नाना साहब को पेशवा घोषित किया गया।
  3. 3. ग्वालियर के युद्ध में अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए 18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं, जबकि तात्या टोपे बच निकलने में सफल रहे और बाद में मध्य भारत के जंगलों में अंग्रेजों के विरुद्ध छापामार युद्ध का संचालन करते हुए अपने एक विश्वासी जमींदार मानसिंह के विश्वासघात के कारण पकड़े गए।
  4. 4. सर ह्यूरोज ने रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस और युद्ध कौशल से प्रभावित होकर टिप्पणी की थी कि 'विद्रोही नेताओं में रानी लक्ष्मीबाई अकेली ऐसी थीं जो सर्वश्रेष्ठ और सबसे बहादुर महिला थीं'।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान झाँसी और ग्वालियर का क्षेत्र सशस्त्र संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा। मार्च 1858 में ब्रिटिश सेनापति सर ह्यूरोज ने झाँसी पर आक्रमण किया। रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया और अंततः कालपी पहुंचकर तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। कालपी के पतन के पश्चात दोनों ने ग्वालियर के किले पर अधिकार किया, किंतु यहाँ जयाजीराव सिंधिया अंग्रेजों के साथ मिल गए थे और ग्वालियर में नाना साहब को नहीं बल्कि स्वयं को पेशवा के रूप में स्वायत्तता देने की बात थी (ग्वालियर में तात्या टोपे और रानी ने अधिकार किया था, लेकिन नाना साहब वहाँ प्रत्यक्ष रूप से पेशवा के रूप में स्थापित नहीं हुए थे, अतः कथन 2 आंशिक रूप से भ्रामक है)। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। सर ह्यूरोज ने उनके बारे में कहा था कि 'वह विद्रोहियों में सर्वश्रेष्ठ और सबसे बहादुर नेता थीं'। तात्या टोपे को बाद में नरवर के जागीरदार मानसिंह के विश्वासघात के कारण पकड़ा गया और अप्रैल 1859 में फाँसी दे दी गई। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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