BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

History of India
1 views

मध्यकालीन भारत के इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों के प्रसार तथा उनके दार्शनिक दृष्टिकोण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. सूफी मत के 'चिश्ती सिलसिले' के प्रसिद्ध संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य और उत्तराधिकारी ख्वाजा बख्तियार काकी थे, जिनके सम्मान में दिल्ली में कुतुब मीनार का निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया था।
  2. 2. भक्ति आंदोलन के प्रणेता के रूप में प्रसिद्ध संत रामानंद ने जातिगत भेदभाव को नकारते हुए सभी जातियों के लोगों को अपने शिष्य बनाया, जिनमें कबीर (जुलाहा), रैदास (मोची), सेना (नाई) और पीपा (राजपूत शासक) प्रमुख थे।
  3. 3. दक्षिण भारत के अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने अपनी कविताओं और भजनों में तमिल भाषा को माध्यम बनाया तथा 'नलइरा दिव्य प्रबंधम' को तमिल वेद के रूप में मान्यता दिलाई।
  4. 4. सूफी संतों की विचारधारा में 'वल्दत-उल-वुजूद' (अस्तित्व की एकता) का सिद्धांत इब्न-अरबी द्वारा प्रतिपादित किया गया था, जिसका अर्थ है कि सृष्टिकर्ता और उसकी रचना में कोई वास्तविक भेद नहीं है, जो अद्वैत वेदांत दर्शन के काफी निकट है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी संतों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और धार्मिक पाखंडों का विरोध करते हुए मानवता और प्रेम का संदेश दिया। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के प्रमुख शिष्य ख्वाजा बख्तियार काकी थे, जिनकी स्मृति में कुतुबद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश ने दिल्ली में विकिपीडिया संदर्भ (कुतुब मीनार) का निर्माण करवाया था। संत रामानंद ने उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाया और कबीर, रैदास, सेना तथा पीपा जैसे विभिन्न जातियों और पृष्ठभूमियों के लोगों को अपना शिष्य स्वीकार किया। दक्षिण भारत में अलवार और नयनार संतों ने भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया और 'नलइरा दिव्य प्रबंधम' को तमिल वेद का दर्जा मिला। इसके अतिरिक्त, सूफी संत इब्न-अरबी द्वारा प्रतिपादित 'वल्दत-उल-वुजूद' (Unity of Being) का सिद्धांत शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन से अत्यधिक समानता रखता है। अतः उपर्युक्त चारों कथन पूर्णतः सही हैं।
Share:

Related Questions

औरंगजेब ने किस वर्ष बीजापुर (1686) और गोलकुंडा (1687) को मुगल साम्राज्य में मिलाया था? वर्ष 1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारणों और बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे की घटना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. बंगाल सेना में पुरानी ब्राउन बेस मस्कट बंदूक के स्थान पर शामिल की गई नई 'एनफील्ड राइफल' के कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी होने की अफवाह ने भारतीय सैनिकों में भारी आक्रोश उत्पन्न किया था। 2. 34वीं नेटिव इन्फैंट्री (बैरकपुर छावनी) के सिपाही मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को चर्बी वाले कारतूसों के प्रयोग का कड़ा विरोध करते हुए अपने अंग्रेजी अधिकारियों लेफ्टिनेंट बॉग और सार्जेंट ह्यूसन पर आक्रमण कर दिया था। 3. मंगल पांडे को गिरफ्तार करने से इनकार करने वाले और उनके नेतृत्व को समर्थन देने वाले रेजिमेंट के भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों द्वारा तुरंत क्षमादान दे दिया गया था और किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई थी। 4. मंगल पांडे पर त्वरित कार्रवाई करते हुए ब्रिटिश सैन्य अदालत ने उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई और निर्धारित तिथि से पहले ही 8 अप्रैल 1857 को उन्हें बैरकपुर में फांसी पर लटका दिया गया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? मुगल काल में "कनकुत" (Kankut) विधि का अर्थ क्या था? वर्ष 1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारणों और बैरकपुर छावनी (34वीं नेटिव इन्फैंट्री) की घटना के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. ब्रिटिश सेना में जनवरी 1857 से पुरानी 'ब्राउन बेस' बन्दूक के स्थान पर नई 'एनफील्ड राइفل' को शामिल किया गया था, जिसके कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी होने की अफवाह ने भारतीय सैनिकों में भारी असंतोष पैदा कर दिया था। 2. बैरकपुर छावनी में 34वीं नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को चर्बी वाले कारतूसों के प्रयोग के विरोध में सार्जेंट ह्यूग बांघ और लेफ्टिनेंट बॉब पर आक्रमण कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 8 अप्रैल 1857 को फाँसी दे दी गई थी। 3. मंगल पांडे द्वारा विद्रोह की शुरुआत करने के तुरंत बाद बैरकपुर छावनी के सभी भारतीय सैनिकों ने एकजुट होकर एक साथ दिल्ली की ओर कूच कर दिया था और संपूर्ण बंगाल रेजिमेंट ने अंग्रेजों के विरुद्ध औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा कर दी थी। 4. इस घटना के उपरांत ब्रिटिश सेना प्रशासन ने संलिप्तता और अनुशासनहीनता के संदेह में 34वीं नेटिव इन्फैंट्री के उस संपूर्ण रेजिमेंट को औपचारिक रूप से भंग (Disband) कर दिया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? 1857 के विद्रोह के उपरांत ब्रिटिश संसद द्वारा पारित 'भारत सरकार अधिनियम, 1858' और क्वीन विक्टोरिया की घोषणा (Proclamation of 1858) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस अधिनियम के माध्यम से भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी) के अधीन कर दिया गया तथा 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' और 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' को समाप्त कर समस्त शक्तियाँ भारत के राज्य सचिव (Secretary of State for India) और उसकी सहायता के लिए गठित 15 सदस्यीय परिषद में निहित कर दी गईं। 2. क्वीन विक्टोरिया की ऐतिहासिक घोषणा (जिसे इलाहाबाद दरबार में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पढ़ा गया था) में देशी रियासतों के राजाओं को भविष्य में 'व्यपगत सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) के तहत राज्य हड़पने की नीति से पूरी तरह मुक्त करते हुए उनके दत्तक पुत्र लेने के अधिकार को स्वीकार किया गया। 3. इस घोषणा में ब्रिटिश सरकार ने यह स्पष्ट आश्वासन दिया कि भारत की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा तथा नस्ल या धर्म के भेदभाव के बिना सार्वजनिक सेवाओं में भारतीयों को उनकी योग्यता के आधार पर उचित और निष्पक्ष अवसर प्रदान किए जाएंगे। 4. इस अधिनियम द्वारा भारत के गवर्नर-जनरल का पद समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर सीधे ब्रिटिश मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ सदस्य को 'भारत के सम्राट' (Viceroy and Emperor of India) के रूप में भारत का सर्वोच्च प्रशासक नियुक्त किया गया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.