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History of India
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. अवध में विद्रोह की शुरुआत 30 मई 1857 को हुई, जिसके पश्चात बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरjis कादिर को नवाब घोषित कर सत्ता संभाली और कैम्पबेल तथा आउट्राम की संयुक्त अंग्रेजी सेना के विरुद्ध लखनऊ की रक्षा का कड़ा प्रतिरोध किया।
- 2. 'फैजाबाद के मौलवी' के रूप में प्रसिद्ध अहमदुल्लाह शाह ने चिनहट के युद्ध में ब्रिटिश सेना को करारी मात दी थी, तथा उनकी अद्भुत सैन्य नेतृत्व क्षमता और ब्रिटिश विरोधी कट्टर रुख के कारण अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए पचास हजार रुपये का भारी इनाम घोषित किया था।
- 3. बेगम हजरत महल ने अवध के पतन के उपरांत अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था और ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई पेंशन को स्वीकार कर लखनऊ में ही अपने जीवन के अंतिम दिन व्यतीत किए।
- 4. मौलवी अहमदुल्लाह शाह को अंततः रुहेलखंड से ब्रिटिश समर्थक पुवायाँ के राजा के पास शरण लेने के दौरान हुए विश्वासघात के बाद ब्रिटिश सेना द्वारा मार दिया गया था, और उनके शव के साथ ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई थी। बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादिर को अवध का नवाब घोषित कर प्रशासनिक और सैन्य मोर्चे पर अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। चिनहट के प्रसिद्ध युद्ध (30 जून 1857) में मौलवी अहमदुल्लाह शाह के नेतृत्व में विद्रोहियों ने हेनरी लॉरेन्स के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना को पराजित किया था। ब्रिटिश शासन के प्रति उनकी प्रखर वैचारिक और सैन्य चुनौती के कारण अंग्रेजों ने उनपर पचास हजार रुपये का इनाम रखा था। पुवायाँ के राजा जगन्नाथ सिंह के यहाँ आश्रय लेने के प्रयास के दौरान हुए विश्वासघात में मौलवी साहब मारे गए थे। इसके विपरीत, बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों के समक्ष कभी आत्मसमर्पण नहीं किया, बल्कि अवध के पतन के पश्चात वे नेपाल चली गईं और वहीं उनकी मृत्यु हुई। इस प्रकार कथन 1, 2 और 4 सही हैं, जबकि कथन 3 असत्य है। विकिपीडिया संदर्भ
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध धर्म के 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (कारण-कार्य सिद्धांत) के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी कारण से उत्पन्न हुई है और यह शून्यवाद के अत्यधिक निकट है, जबकि जैन धर्म का 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद) यह प्रतिपादित करता है कि ज्ञान सापेक्ष होता है और किसी भी वस्तु के सत्य का पूर्ण निर्धारण एकांगी दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता।
2. बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने के लिए 'प्रव्रज्या' संस्कार अनिवार्य था, जिसके उपरांत नवदीक्षित भिक्षु को दस शिक्षापदों का पालन करना होता था, जबकि जैन संघ में महावीर स्वामी ने गृहस्थ जीवन त्यागने वाले व्यक्तियों के लिए संलेखना (संतारा) विधि के अलावा पांच महाव्रतों का कठोरता से पालन करना अनिवार्य किया था।
3. बौद्ध धर्म के हीनयान संप्रदाय ने बुद्ध को भगवान मानकर उनकी मूर्तियों की पूजा शुरू की और बोधगया में महाबोधि मंदिर का निर्माण कराया, जबकि महायान संप्रदाय बुद्ध को एक महापुरुष और मार्गदर्शक मानकर उनके मूल उपदेशों (अष्टम मार्ग) पर टिके रहने का समर्थन करता रहा।
4. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी मोक्ष प्राप्ति के लिए नग्न रहने (वस्त्र त्यागने) को अनिवार्य मानते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी श्वेत वस्त्र धारण करने की अनुमति देते हैं और स्त्री मुक्ति को संभव मानते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मध्यकालीन भारत के सूफी आंदोलनों तथा उनके विभिन्नसिलसिलों (संप्रदायों) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में चिश्ती सिलसिला की स्थापना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने की थी, जिनका मुख्य केंद्र अजमेर था, और इस सिलसिले के संतों ने राज्य के राजकीय संरक्षण तथा शाही दरबारों से संबंध रखने को अनिवार्य माना ताकि जनता के कल्याण के लिए धन जुटाया जा सके।
2. सुहरावर्दी सिलसिला मुख्य रूप से सिंध और मुल्तान के क्षेत्रों में अधिक सक्रिय था, तथा चिश्ती संतों के विपरीत सुहरावर्दी संतों ने राजनीतिक सत्ता से दूरी नहीं बनाई बल्कि सुल्तानों और अमीर-उमरावों से वित्तीय सहायता (इनाम और जागीरें) स्वीकार की थी।
3. कादिरिया सिलसिले की स्थापना भारत में शाह नेमतुल्लाह द्वारा की गई थी, और इस सिलसिले के प्रसिद्ध संत मियां मीर थे, जिनसे मुगल राजकुमार दारा शिकोह और शाहजहां ने आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा की थी।
4. नक्सबंदी सिलसिले की स्थापना भारत में ख्वाजा बाकी بالله (Baqi Billah) द्वारा की गई थी, और इस सिलसिले के सबसे प्रमुख संत शेख अहमद सरहिंदी (मुजद्दिद अलिफसानी) थे, जिन्होंने अकबर की उदार धार्मिक नीतियों और 'दीन-ए-इलाही' की कड़ी आलोचना की थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और उनके संस्थापकों/विचारकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'आत्मीय सभा' (1815) और बाद में 'ब्रह्म समाज' (1828) का मुख्य उद्देश्य मूर्तिपूजा का विरोध, एकेश्वरवाद का प्रचार तथा हिंदू समाज में व्याप्त कुप्रथाओं जैसे सती प्रथा का उन्मूलन करना था।
2. स्वामी दयानंद सरस्वती ने वर्ष 1875 में 'आर्य समाज' की स्थापना की और 'वेदों की ओर लौटो' का नारा देते हुए मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद और बाल विवाह का जोरदार खंडन किया, साथ ही शुद्धिकरण आंदोलन की शुरुआत की।
3. केशव चंद्र सेन के नेतृत्व में ब्रह्म समाज में हुए वैचारिक मतभेदों के परिणामस्वरूप वर्ष 1866 में देवेंद्रनाथ ठाकुर ने 'साधारण ब्रह्म समाज' की स्थापना की, जबकि केशव चंद्र सेन ने 'भारतीय ब्रह्म समाज' का गठन किया था।
4. यंग बंगाल आंदोलन (Young Bengal Movement) के प्रवर्तक हेनरी लुई विवियन डेरोज़ियो ने कलकत्ता के हिंदू कॉलेज में शिक्षण कार्य करते हुए अपने विद्यार्थियों को रूढ़िवादी परंपराओं पर अंधविश्वास करने के बजाय स्वतंत्र रूप से सोचने और तर्कसंगत विचार अपनाने के लिए प्रेरित किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, केंद्रीय अधिकारियों (तीर्थों) और प्रांतीय प्रशासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौर्य प्रशासन में सर्वोच्च स्तर के अधिकारियों को 'तीर्थ' कहा जाता था, जिनकी संख्या अर्थशास्त्र के अनुसार अठारह थी; इनमें 'समहर्त्ता' आय के संग्रहण और वार्षिक बजट तैयार करने का मुख्य अधिकारी होता था, जबकि 'संनिधातृ' राजकोष और भण्डार गृह का मुख्य संरक्षक था।
2. अशोक के शासनकाल में प्रांतीय प्रशासन के अंतर्गत साम्राज्य चार प्रमुख प्रांतों में विभाजित था, जिनकी राजधानियाँ तक्षशिला, उज्जैन, सुवर्णगिरि और तोसली थीं, और इन प्रांतों का शासन सामान्यतः शाही परिवार के राजकुमारों (कुमार या आर्यपुत्र) द्वारा चलाया जाता था।
3. मौर्यकालीन नगर प्रशासन 'मेगास्थनीज' के विवरण के अनुसार छह समितियों में विभाजित था, जिसमें प्रत्येक समिति में पाँच सदस्य होते थे और तीसरी समिति का प्रमुख कार्य जन्म-मृत्यु का पंजीकरण रखना था जो विश्व के शुरुआती जनगणना अभिलेखों में से एक माना जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान बिहार के विभिन्न क्षेत्रों (पटना, दानापुर, आरा, मुजफ्फरपुर और छपरा) में हुए घटनाक्रमों और उनके नेतृत्वकर्ताओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पटना में 3 जुलाई 1857 को हुए विद्रोह का नेतृत्व पीर अली खान नामक पुस्तक विक्रेता ने किया था, जिसे कमिश्नर विलियम टेलर के आदेश पर गिरफ्तार कर सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई थी।
2. दानापुर छावनी के 7वीं, 8वीं और 40वीं रेजिमेंट के सिपाहियों ने 25 जुलाई 1857 को विद्रोह कर दिया और सोन नदी पार कर सीधे आरा की ओर प्रस्थान किया, जहाँ उन्होंने बाबू कुंवर सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा संभाला।
3. मुजफ्फरपुर और छपरा (सारण) क्षेत्र में 1857 के विद्रोह के दौरान स्थानीय जमींदारों और यूरोपीय अधिकारियों के मध्य हिंसक संघर्ष हुआ, तथा छपरा में मोहम्मद हुसैन खान के नेतृत्व में विद्रोहियों ने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी थी।
4. पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने बिहार में विद्रोह के शुरुआती दौर में अत्यधिक नरमी बरतते हुए किसी भी स्थानीय नेता को गिरफ्तार करने से इनकार कर दिया था, जिससे सम्पूर्ण बिहार में अंग्रेजों की पकड़ मजबूत हो गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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