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History of India
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मध्यकालीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में 'भक्ति और सूफी आंदोलन' के प्रसार, उनकी दार्शनिक मान्यताओं तथा संतों के योगदान के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. दक्षिण भारत के अलवार (वैष्णव) और नयनार (शैव) संतों ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी थी, जिन्होंने जातिगत भेदभाव और वैदिक कर्मकांडों की कठोरता का विरोध करते हुए तमिल भाषा में भजनों के माध्यम से ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत प्रेम और समर्पण (भक्ति) पर बल दिया।
  2. 2. सूफी संत चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने भारत में इस सिलसिले की स्थापना की, किंतु दिल्ली में चिश्ती सिलसिले को लोकप्रिय बनाने और स्थापित करने का मुख्य श्रेय शेख निजामुद्दीन औलिया को जाता है, जिन्होंने 'वदत-उल-वजूद' (अस्तित्व की एकता) के सिद्धांत का समर्थन किया था।
  3. 3. 15वीं शताब्दी के महान संत कबीर दास ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल दिया और वेदों व कुरान दोनों की बाह्य धार्मिक रूढ़ियों, मूर्तिपूजा तथा जाति व्यवस्था पर तीव्र प्रहार किया, तथा उनकी रचनाओं का संकलन उनके शिष्यों द्वारा 'बीजक' के रूप में किया गया था।
  4. 4. सगुण भक्ति धारा के प्रमुख संत तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' की रचना अवधी भाषा में की, और वे अकबर के समकालीन थे, जिन्होंने अकबर के दरबार में नियमित रूप से उपस्थित होकर मनसबदारी पद स्वीकार किया था और शाही संरक्षण प्राप्त किया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 3 सही हैं। दक्षिण भारत में अलवार और नयनार संतों ने भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाया। चिश्ती सिलसिले के तहत शेख निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली में इसे स्थापित किया और 'वदत-उल-वजूद' का समर्थन किया। कबीर दास निर्गुण संत थे और उनकी वाणी 'बीजक' में संकलित है। किंतु कथन 4 असत्य है क्योंकि संत तुलसीदास अकबर के समकालीन अवश्य थे, लेकिन उन्होंने कभी भी मुगल दरबार से कोई शाही संरक्षण या मनसबदारी पद स्वीकार नहीं किया था, वे पूरी तरह स्वतंत्र जीवन जीते थे। सूफी और भक्ति परंपराओं के बारे में अधिक जानने के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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