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History of India
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मुगल काल में "चारबाग" (Charbagh) शैली के उद्यानों की परंपरा किसने शुरू की थी?

Detailed Explanation

बाबर ने भारत में चारबाग शैली के उद्यानों की शुरुआत की थी।
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वर्धन राजवंश तथा पल्लव एवं चालुक्य राजवंशों के संघर्ष और उनकी प्रशासनिक व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. हर्षवर्द्धन ने कामरूप के राजा भास्करवर्मा के साथ राजनीतिक गठबंधन किया था और कन्नौज की धर्मसभा में महायान बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ-साथ ह्वेनसांग के सम्मान में एक भव्य समारोह का आयोजन किया था। 2. पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्द्धन के दक्षिण की ओर विस्तार को निर्णायक रूप से रोका था, जिसकी जानकारी हमें एहोल प्रशस्ति से मिलती है जिसकी रचना रविकीर्ति ने की थी। 3. पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापी (बादामी) पर अधिकार कर लिया था और 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की थी, जबकि इसी राजवंश के राजा राजसिंह (नरिंसहवर्मन द्वितीय) ने महाबलीपुरम के प्रसिद्ध तटीय मंदिर (Shore Temple) का निर्माण करवाया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था, प्रशासनिक संरचना और भूमि अनुदान व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. गुप्त काल में 'अग्रहार' भूमि वह भूमि होती थी जो मंदिरों और ब्राह्मणों को कर-मुक्त रूप से दान दी जाती थी, जिस पर स्थानीय प्रशासकों का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था। 2. गुप्त सम्राटों द्वारा जारी किए गए स्वर्ण सिक्के (जिसे 'दीनार' कहा जाता था) कुषाणों के स्वर्ण सिक्कों की तुलना में अधिक शुद्धता और कलात्मक सुंदरता प्रदर्शित करते थे, विशेष रूप से कुमारगुप्त प्रथम के मयूर प्रकार के सिक्के। 3. इस काल में व्यापारिक गतिविधियों में गिरावट आने के कारण श्रेणी (Guilds) व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो गई थी और मुद्रा अर्थव्यवस्था का स्थान पूर्णतः वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) ने ले लिया था। 4. गुप्त प्रशासन में प्रांत को 'भुक्ति' कहा जाता था, जिसके प्रमुख को 'उपरिक' कहा जाता था, तथा भुक्तियों का विभाजन 'विषय' (जिला) में होता था, जिसके प्रशासनिक अधिकारी को 'विषयपति' कहा जाता था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? लोदी काल में अमीरों को दिए गए भूमि अनुदानों को क्या कहा जाता था? चंपारण सत्याग्रह (1917) और खेड़ा सत्याग्रह (1918) के ऐतिहासिक घटनाक्रम तथा महात्मा गांधी के शुरुआती आंदोलनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. चंपारण में यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा किसानों को अपनी कुल भूमि के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करने के लिए बाध्य करने वाली कुख्यात 'तीनकठिया पद्धति' प्रचलित थी, जिसके विरुद्ध महात्मा गांधी ने भारत में अपने प्रथम सविनय अवज्ञा आंदोलन का सफल प्रयोग किया था। 2. खेड़ा सत्याग्रह के दौरान, अतिवृष्टि और फसल नष्ट हो जाने के कारण किसानों की दयनीय स्थिति को देखते हुए राजस्व संहिता के नियमों के तहत लगान में पूर्ण छूट दिए जाने का प्रावधान था, परंतु ब्रिटिश प्रशासन द्वारा लगान वसूली पर जोर दिए जाने पर गांधीजी ने किसानों को 'नो-रेंट' (लगान अदायगी न करने) आंदोलन चलाने का स्पष्ट निर्देश दिया था, जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनके प्रमुख सहयोगी के रूप में कार्य किया था। 3. चंपारण जाँच समिति (Champaran Agrarian Enquiry Committee) के एक आधिकारिक सदस्य के रूप में ब्रिटिश सरकार ने स्वयं महात्मा गांधी को भी शामिल किया था, जिसकी संस्तुतियों के आधार पर बाद में 'चंपारण कृषि अधिनियम' (Champaran Agrarian Act) पारित किया गया और तीनकठिया प्रथा को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया। 4. खेड़ा सत्याग्रह के दौरान ही महात्मा गांधी को पहली बार 'महात्मा' की उपाधि से सम्मानित किया गया था, और इसी आंदोलन की सफलता से प्रेरित होकर उन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह की रूपरेखा तैयार की थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? ब्रिटिश भारत में लागू की गई भू-राजस्व प्रणालियों और उनके आर्थिक प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. स्थाई बंदोबस्त के अंतर्गत बंगाल और बिहार के क्षेत्रों में राजस्व की मांग हमेशा के लिए निश्चित कर दी गई, जिसके परिणामस्वरूप जमींदारों द्वारा लगान न चुकाए जाने की स्थिति में उनकी जमींदारी नीलाम करने के लिए 'सूर्यास्त कानून' (Sunset Law) का प्रावधान किया गया था। 2. रयतवारी व्यवस्था के अंतर्गत भूमि का स्वामित्व सीधे किसानों के पास था और सरकार द्वारा भू-राजस्व की दरों को अत्यधिक उच्च (लगभग 45 से 50 प्रतिशत तक) रखा गया था, जिन्हें नियमित अंतरालों पर संशोधित किया जाता था। 3. महालवारी व्यवस्था के तहत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर किया जाता था और लगान अदायगी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी प्रत्येक कृषक की होती थी, जिसमें ग्राम समुदाय या लंबरदार की कोई सामूहिक जवाबदेही नहीं होती थी। 4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों का दीर्घकालिक प्रभाव यह हुआ कि भारतीय कृषि का तेजी से वाणिज्यीकरण हुआ, जिससे किसानों की स्थिति सुधरने के बजाय वे साहूकारों और महाजनों के चंगुल में फंसते चले गए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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