त्वरित लिंक्स
Indian Polity
24 views
राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण तथा मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के संबंधों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र में न होने पर अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग अपने व्यक्तिगत विवेक से (मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना) किसी भी समय कर सकता है, यदि उसे ऐसा प्रतीत हो कि तत्काल कार्रवाई आवश्यक है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
- 3. राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत क्षमादान की शक्ति प्राप्त है, जिसके अंतर्गत वह मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह से क्षमा करने की शक्ति भी रखता है, जो राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति के पूर्णतः समरूप है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि राज्यपाल अनुच्छेद 213 के तहत अध्यादेश अपनी मर्जी से या मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना जारी नहीं कर सकता। राज्यपाल के लिए यह अनिवार्य है कि वह ऐसा करने से पहले मंत्रिपरिषद से सलाह ले (कुछ विशेष मामलों को छोड़कर जहाँ राष्ट्रपति के निर्देश की आवश्यकता होती है)। कथन 2 सत्य है; अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर होती है, साथ ही मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। कथन 3 असत्य है; भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को क्षमादान की शक्ति तो प्राप्त है, किंतु उसे मृत्युदंड को पूरी तरह से क्षमा (Pardon) करने की शक्ति प्राप्त नहीं है, और न ही वह सैन्य न्यायालय (Court Martial) के दंड को माफ कर सकता है। मृत्युदंड पर पूर्ण क्षमादान की शक्ति केवल भारत के राष्ट्रपति के पास है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
Related Questions
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अपीलीय अधिकारिता, रिट अधिकारिता तथा संविधान की व्याख्या से जुड़े प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को भारत के राज्यक्षेत्र के किसी न्यायालय या अधिकरण (Tribunal) द्वारा किसी भी वाद या मामले में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री, निर्धारण, सेंटेंस या आदेश की अपील के लिए 'विशेष अनुमति' (Special Leave to Appeal) प्रदान करने की विवेकपरायण शक्ति प्राप्त है, और सैन्य न्यायालयों (Armed Forces Tribunals) के निर्णय इस अधिकारिता के पूर्ण अपवाद हैं तथा उनके विरुद्ध इस अनुच्छेद के तहत अपील नहीं की जा सकती।
2. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण जैसी रिट जारी कर सकता है, तथा इस अधिकारिता के प्रयोग का क्षेत्र केवल उन मामलों तक सीमित है जहाँ किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो, और न्यायालय सामान्य विधिक अधिकारों के उल्लंघन पर इस अनुच्छेद के तहत रिट जारी नहीं कर सकता।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत पूर्ण न्याय (Complete Justice) करने की उसकी शक्ति संविधान के किसी भी सांविधिक कानून के उपबंधों को दरकिनार या अतिक्रमित कर सकती है, बशर्ते वह आदेश देश में सामाजिक-आर्थिक न्याय को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पारित किया गया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधाई, प्रशासनिक संबंधों तथा अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को लोक हित में अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और इस परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना, ऐसे विषयों पर विचार-विमर्श करना जिनमें राज्यों के साझा हित हों, तथा बेहतर समन्वय के लिए संस्तुतियाँ देना है, किंतु इस परिषद् द्वारा दिए गए निर्णय और संस्तुतियाँ संबंधित राज्य सरकारों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी (Legally Binding) होती हैं।
2. सरकारिया आयोग (1983-88) की संस्तुतियों के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा स्थायी अंतर-राज्यीय परिषद् का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, और इसके सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, संघ राज्य क्षेत्रों (जहाँ विधानसभाएँ हैं) के मुख्यमंत्री, तथा प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत केंद्रीय मंत्रिपरिषद के कैबिनेट स्तर के छह मंत्री शामिल होते हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 258 के अंतर्गत राष्ट्रपति, किसी राज्य की सरकार की सहमति से उस सरकार को या उसके अधिकारियों को ऐसे कृत्यों को सौंप सकता है जो संघ की कार्यकारी शक्ति के अंतर्गत आते हैं, और इसके विपरीत अनुच्छेद 258A के अनुसार किसी राज्य का राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से उस केंद्र सरकार को अपने राज्य की कार्यकारी शक्ति के अधीन आने वाले कार्य सौंप सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा से संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 51 के अंतर्गत राज्य, अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि करने, राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानजनक संबंधों को बनाए रखने, संगठित लोगों के आपसी व्यवहार में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने, तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।
2. नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत उल्लिखित ये अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा संबंधी आदर्श पूर्णतः 'गांधीवादी विचारधारा' पर आधारित हैं, और इनका मुख्य उद्देश्य देश के भीतर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर अहिंसा को बढ़ावा देना है।
3. यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और देश के विधان बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य है, तथापि अनुच्छेद 37 के अनुसार इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (Justiciable) नहीं बनाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के गठन, विधानसभा (Legislative Assembly) और विधान परिषद (Legislative Council) की संरचना तथा उनकी विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार, संसद किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए विधि बना सकती है, किंतु ऐसा करने के लिए यह अनिवार्य है कि संबंधित राज्य की विधानसभा अपने कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का संकल्प पारित करे।
2. विधान परिषद की अधिकतम संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं हो सकती, सिवाय इसके कि जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के पश्चात कुछ विशिष्ट राज्यों के लिए अपवादस्वरूप इससे कम संख्या का भी प्रावधान किया गया हो।
3. राज्य विधान परिषद के कुल सदस्यों का 1/3 भाग स्थानीय निकायों के निर्वाचक मंडलों द्वारा, 1/12 भाग विश्वविद्यालयों के स्नातकों द्वारा, 1/12 भाग माध्यमिक विद्यालयों से निम्न स्तर के अध्याਪकों द्वारा, 1/3 भाग विधानसभा के सदस्यों द्वारा तथा शेष 1/6 भाग राज्यपाल द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से नामांकित किए जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान में आपातकालीन उपबंधों (Emergency Provisions) और उनसे संबंधित संवैधानिक संशोधनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह प्रावधान किया गया था कि राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, लेकिन इस प्रावधान को बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से यह व्यवस्था की गई थी कि राष्ट्रीय आपातकाल संपूर्ण देश में या देश के किसी विशिष्ट हिस्से में एक साथ लागू किया जा सकता है।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त छह मूल अधिकारों का स्वतः निलंबन केवल 'युद्ध' या 'बाह्य आक्रमण' के आधार पर की गई आपातकाल की उद्घोषणा पर ही लागू होता है, 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर नहीं, और यह महत्वपूर्ण प्रावधान मूल संविधान में ही विद्यमान था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.