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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत वर्णित मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. अनुच्छेद 15(5) के तहत राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए नागरिकों के वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षण संस्थानों (निजी शिक्षण संस्थानों सहित, चाहे वे सहायता प्राप्त हों या अशासकीय) में प्रवेश के लिए विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गई है, सिवाय अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के।
  2. 2. अनुच्छेद 20(2) के अंतर्गत प्रदान किया गया 'दोहरे खतरे' (Double Jeopardy) का संरक्षण केवल किसी न्यायालय या न्यायिक अधिकरण (Judicial Tribunal) के समक्ष अभियोजन और दंड पर लागू होता है, और यह विभागीय या प्रशासनिक प्राधिकारियों द्वारा दी गई कार्यवाहियों और दंडों पर विस्तारित नहीं होता है।
  3. 3. अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में 'त्वरित विचारण' (Speedy Trial) का अधिकार भी शामिल है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 'हुस्नारा खातून बनाम बिहार राज्य' वाद में एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 15(5) को 93वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2005 द्वारा जोड़ा गया था। इसके तहत राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए शिक्षण संस्थानों (अनुच्छेद 30(1) में उल्लिखित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को छोड़कर) में प्रवेश के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति दी गई है, जिसमें सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थान भी शामिल हैं। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 20(2) के अनुसार किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता है (दोहरा खतरा)। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार इस सुरक्षा का लाभ केवल न्यायिक न्यायालयों या अधिकरणों (Tribunals) के समक्ष कार्यवाही के मामलों में ही मिलता है; यह विभागीय या प्रशासनिक प्राधिकारियों (जैसे विभागीय जांच या अनुशासनात्मक कार्रवाई) द्वारा दी गई पेनल्टी या दंड के खिलाफ उपलब्ध नहीं है। कथन 3 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने 'हुस्नारा खातून बनाम बिहार राज्य' (1979) और कई अन्य बाद के मामलों में यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त 'दैहिक स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार' में 'त्वरित विचारण' (Speedy Trial) का अधिकार एक अंतर्निहित मौलिक अधिकार है, ताकि विचाराधीन कैदियों को अनिश्चित काल तक न्याय से वंचित न रहना पड़े। इस विषय को विस्तार से पढ़ने के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।
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