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Indian Polity
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, राजभाषा तथा राजनीतिक दलों के विनियमन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें बाद में विभिन्न संवैधानिक संशोधनों (जैसे 21वें, 71वें और 92वें संशोधनों) के माध्यम से बढ़ाकर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, और अंग्रेजी भाषा इन 22 भाषाओं में शामिल नहीं है।
- 2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) राजनीतिक दलों का पंजीकरण करता है, किंतु एक बार पंजीकृत होने के बाद निर्वाचन आयोग को किसी भी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने या वापस लेने की वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
- 3. संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून), जिसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था, के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि यदि सदन का कोई सदस्य अपने राजनीतिक दल के व्हिप (Whip) के विरुद्ध सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी, और इस संबंध में पीठासीन अधिकारी द्वारा लिया गया निर्णय अंतिम होता है जिसकी न्यायिक समीक्षा किसी भी न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं। बाद में 21वें संशोधन (1967) द्वारा सिंधी, 71वें संशोधन (1992) द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली, तथा 92वें संशोधन (2003) द्वारा बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली जोड़ी गईं, जिससे कुल संख्या 22 हो गई है। अंग्रेजी इस अनुसूची में शामिल नहीं है। कथन 2 गलत है: सर्वोच्च न्यायालय के 'सुब्रह्मण्यम स्वामी बनाम चुनाव आयोग' (2016) मामले के निर्णय के अनुसार, निर्वाचन आयोग को उन राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है जिन्होंने धोखाधड़ी से पंजीकरण कराया है या जो संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ का उल्लंघन करते हैं। कथन 3 गलत है: हालांकि दसवीं अनुसूची के तहत पीठासीन अधिकारी का निर्णय अंतिम होता है, किंतु 'किहोटो होलोहन बनाम जाचिलू' (1992) वाद में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है। इस विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान सभा के गठन और इसकी निर्माण प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान सभा के सदस्यों का चयन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के माध्यम से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर किया गया था, जिसमें ब्रिटिश प्रांतों के साथ-साथ देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को भी मनोनीत किया गया था।
2. 'माउंटबेटन योजना' (3 जून 1947) के तहत भारत के विभाजन के पश्चात संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या को घटाकर 299 कर दिया गया था, जिसमें से ब्रिटिश भारत के लिए 229 और देशी रियाسतों के लिए 70 प्रतिनिधि निर्धारित किए गए थे।
3. संविधान सभा की कुल महिला सदस्यों की संख्या 15 थी, जिनमें से 'दक्षयानी वेलायुडन' एकमात्र ऐसी महिला सदस्य थीं जो अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) वर्ग से संबंधित थीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के निर्माण और संविधान सभा की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान सभा के लिए जुलाई-अगस्त 1946 में हुए चुनावों में कुल 296 सीटों के लिए ब्रिटिश भारत के प्रांतों का चुनाव हुआ था, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 208 सीटें और मुस्लिम लीग को 73 सीटें प्राप्त हुई थीं।
2. संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को आयोजित की गई थी, जिसका मुस्लिम लीग द्वारा बहिष्कार किया गया था, और इस बैठक में सभा के अस्थायी अध्यक्ष के रूप में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को फ्रांस की परंपरा के अनुसार सबसे वरिष्ठ सदस्य होने के नाते चुना गया था।
3. रियासतों (Princely States) के प्रतिनिधियों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा जनता के प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से किया गया था, क्योंकि वे ब्रिटिश प्रांतों की तरह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व चाहते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, उनके कार्यान्वयन तथा न्यायसंगतता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित किया गया है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मौलिक हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं ठहराया जा सकता है, अर्थात् इनके उल्लंघन पर न्यायालय द्वारा इन्हें प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न बादों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह प्रतिपादित किया है कि संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) के अंतर्गत मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं, तथा किसी सामाजिक कल्याणकारी कानून को लागू करने के लिए अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के नीति निर्देशक तत्वों को अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों पर प्राथमिकता दी जा सकती है।
3. राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में केवल समाजवादी और उदारवादी-बौद्धिक सिद्धांत ही शामिल हैं, तथा इसमें प्राचीन भारतीय ग्राम पंचायतों के गठन या कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने जैसे गांधीवादी आदर्शों के लिए कोई पृथक् संवैधानिक निर्देश प्रदान नहीं किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की शक्तियों, क्षेत्राधिकारों और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 131 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का आरंभिक और अनन्य क्षेत्राधिकार (Original and Exclusive Jurisdiction) केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच अथवा दो या अधिक राज्यों के बीच किसी ऐसे कानूनी विवाद तक विस्तृत है, जिसमें किसी विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न का अस्तित्व हो जिस पर किसी विधिक अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर करता है, और इस क्षेत्राधिकार के अंतर्गत संसद या किसी राज्य की विधानसभाओं के बीच उत्पन्न राजनीतिक विवाद भी शामिल किए जाते हैं।
2. अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्राप्त है, और यदि सार्वजनिक महत्व के किसी प्रश्न पर राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय से राय मांगी जाती है, तो उच्चतम न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपनी राय राष्ट्रपति को दे, तथा न्यायालय द्वारा दी गई वह परामर्शदात्री सलाह संबंधित राष्ट्रपति और सरकार पर पूर्णतः बाध्यकारी (Binding) होती है।
3. संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत उच्चतम न्यायालय को अपनी स्वयं की दी गई किसी भी निर्णय या आदेश की समीक्षा (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, और संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि या अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, न्यायालय अपने द्वारा पारित किसी भी निर्णय पर पुनर्विचार कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों (अनुच्छेद 5-11) और नागरिकता अधिनियम, 1955 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 9 यह स्पष्ट रूप से उपबंधित करता है कि यदि भारत का कोई नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो वह स्वतः भारत का नागरिक नहीं रहेगा, और इस संबंध में संसद को कानून बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
2. नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत भारत की नागरिकता केवल पांच तरीकों से प्राप्त की जा सकती है: जन्म से, वंश द्वारा, पंजीकरण द्वारा, प्राकृतिक रूप से (Naturalisation), और भारत território के किसी भू-भाग के संविलियन (Incorporation of territory) द्वारा।
3. अनुच्छेद 11 संसद को यह पूर्ण अधिकार प्रदान करता है कि वह नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में कोई भी उपबंध कर सके, और संसद द्वारा बनाए गए ऐसे कानून अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता के अधिकार के उल्लंघन के आधार पर न्यायपालिका द्वारा असंवैधानिक घोषित किए जा सकते हैं।
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