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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की सलाहकारिता अधिकारिता (Advisory Jurisdiction) और इसके पुनरावलोकन की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि या तथ्य के किसी ऐसे व्यापक सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर, जो उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, उच्चतम न्यायालय की राय मांग सकता है, और उच्चतम न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को ऐसी राय देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।
- 2. अनुच्छेद 143 के अधीन उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई सलाह राष्ट्रपति पर किसी भी स्थिति में बाध्यकारी नहीं होती है, और न ही ऐसी सलाह को अनुच्छेद 141 के अंतर्गत 'घोषित विधि' (Law declared) माना जा सकता है जो देश के अन्य न्यायालयों पर बाध्यकारी हो।
- 3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित 'कॉलेजियम प्रणाली' (Collegium System) का उल्लेख मूल संविधान में स्पष्ट रूप से किया गया था, जिसे वर्ष 2014 के 99वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) से प्रतिस्थापित किया गया था, किंतु उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा विधि या तथ्य के प्रश्न पर राय मांगे जाने पर, यदि मामला पूर्व-संविधान संधि या समझौते से जुड़ा है, तो उच्चतम न्यायालय के लिए राय देना अनिवार्य (Shall give) है, किंतु सामान्य मामलों में यह न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है कि वह राष्ट्रपति को सलाह दे या न दे (May report)। कथन 2 सत्य है क्योंकि उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत दी गई सलाह केवल एक परामर्श होती है, जो राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं होती और वह इसे मानने के लिए स्वतंत्र हैं। कथन 3 असत्य है क्योंकि 'कॉलेजियम प्रणाली' का उल्लेख मूल संविधान में नहीं था, बल्कि इसका विकास उच्चतम न्यायालय के निर्णयों (द्वितीय और तृतीय न्यायाधीश मामले) के माध्यम से हुआ था। भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था से संबंधित अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की पदावधि, प्रधानमंत्री के उत्तरदायित्व और केंद्रीय मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 67 के अनुसार भारत का उपराष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करता है, किंतु वह राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपने पद का त्याग कर सकता है, और उसे हटाने के लिए राज्यसभा द्वारा अपने तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प और लोकसभा द्वारा उससे सहमत होने पर ही प्रस्ताव पारित माना जाता है, जिसके लिए राज्यसभा में ऐसा संकल्प प्रस्तुत करने से कम से कम चौदह दिन पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।
2. अनुच्छेद 75 (3) के तहत केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका अर्थ यह है कि लोकसभा द्वारा मंत्रिपरिषद के किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी अविश्वास प्रस्ताव या स्थगन प्रस्ताव पारित किए जाने पर संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है, क्योंकि मंत्रिपरिषद का प्रत्येक निर्णय संपूर्ण सरकार का निर्णय माना जाता है।
3. अनुच्छेद 78 के अंतर्गत प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय और विधानविषयक प्रस्ताव राष्ट्रपति को संसूचित करे, तथा राष्ट्रपति द्वारा मांगे जाने पर संघ के प्रशासन और विधानविषयक प्रस्तावों से संबंधित कोई भी जानकारी राष्ट्रपति को उपलब्ध कराए, और यदि राष्ट्रपति किसी विषय पर मंत्रिपरिषद के विचार के बिना ही कोई निर्णय लेने का निर्देश दे, तो प्रधानमंत्री उसे मंत्रिपरिषद के समक्ष विचार के लिए रखने के लिए बाध्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) और अनुच्छेद 22 के उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 22 के उपबंध केवल दंडात्मक नजरबंदी (Punitive Detention) के मामलों में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को संरक्षण प्रदान करते हैं, जबकि निवारक नजरबंदी के अधीन गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्ति को किसी भी प्रकार के संवैधानिक और विधिक सुरक्षा उपाय या अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं।
2. संसद को देश की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं के रखरखाव से संबंधित मामलों के लिए निवारक नजरबंदी से संबंधित कानून बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है, और इस विषय पर राज्य विधानमंडलों को कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं दी गई है।
3. निवारक नजरबंदी के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए तब तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, जब तक कि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उस स्तर की योग्यता रखने वाले व्यक्तियों से मिलकर बने सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) ने इस अवधि से आगे हिरासत बढ़ाने के लिए पर्याप्त कारण न प्रतिवेदित कर दिया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा तथा राज्यसभा की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के प्रावधानों के अनुसार, लोकसभा में लंबित कोई भी साधारण विधेयक (Ordinary Bill) जो राज्यसभा द्वारा पारित नहीं किया गया है, लोकसभा के विघटन पर व्यपगत (Lapse) हो जाता है, किंतु यदि कोई विधेयक राज्यसभा में लंबित है और जिसे लोकसभा ने पारित नहीं किया है, तो वह लोकसभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत बुलाई जाने वाली संसद की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष उसकी अध्यक्षता करता है, तथा दोनों के भी अनुपस्थिति की स्थिति में राज्यसभा के उपसभापति द्वारा इसकी अध्यक्षता की जाती है, क्योंकि राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) कभी भी संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार, जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया जाता है, तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है; राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति दे सकता है या रोक सकता है, किंतु यदि वह धन विधेयक (Money Bill) है, तो राष्ट्रपति न तो उसे अपनी अनुमति रोक सकता है और न ही संसद के पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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धन विधेयक पेश करने से पूर्व किसकी सहमति आवश्यक है?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' को लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे पुनःस्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक होती है, किंतु राज्यसभा इस विधेयक को पारित करने, अस्वीकृत करने या इसमें संशोधन करने (अनुच्छेद 109 की प्रक्रिया के अधीन रहते हुए) की सामान्य विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकती है।
2. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' (जिसमें ऐसा उपबंध है जिससे Consolidated Fund of India से व्यय करना पड़े) को संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन को उस विधेयक पर विचार करने की संस्तुति न कर दी हो।
3. लोकसभा और राज्यसभा के बीच गतिरोध को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान धन विधेयकों (Money Bills) और संविधान संशोधन विधेयकों के अतिरिक्त साधारण विधियों और वित्तीय विधेयकों—दोनों श्रेणियों—के मामलों में लागू होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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