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Indian Polity
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राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण तथा मुख्यमंत्री की स्थिति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को प्रदत्त अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति स्वविवेक की शक्ति नहीं है, बल्कि वह इस शक्ति का प्रयोग राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही कर सकता है, किंतु कुछ विशिष्ट मामलों (जैसे- ऐसे विषय जिन पर कानून बनाने के लिए राज्य विधानमंडल को विधेयक प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति आवश्यक हो) में अध्यादेश प्रख्यापित करने के लिए राज्यपाल को राष्ट्रपति के निर्देशों का अनुपालन करना अनिवार्य होता है।
- 2. अनुच्छेद 164 के उपबंधों के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है, तथा छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातियों के कल्याण के लिए एक पृथक मंत्री का होना अनिवार्य किया गया है, जिसके पास गृह या वित्त विभाग का प्रभार होना संविधान द्वारा अनिवार्य रूप से तय किया गया है।
- 3. अनुच्छेद 167 के अंतर्गत मुख्यमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन के संचालन से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय और विधान-विषयक प्रस्ताव राज्यपाल को संसूचित करे तथा राज्यपाल द्वारा माँगी गई ऐसी सूचनाएँ राज्यपाल को प्रदान करे, जिनका संबंध राज्य के प्रशासनिक मामलों और विधान-विषयक प्रस्तावों से हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार राज्यपाल की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अधीन होती है (स्वविवेक से नहीं), और कुछ मामलों में राष्ट्रपति के निर्देशों के बिना वह अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता है। कथन 2 गलत है क्योंकि छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों के लिए जनजातीय कल्याण का एक पृथक मंत्री होना संवैधानिक रूप से अनिवार्य (अनुच्छेद 164 के तहत) है, किंतु संविधान में यह कहीं भी अनिवार्य नहीं किया गया है कि उस मंत्री के पास अनिवार्य रूप से 'गृह या वित्त विभाग' का ही प्रभार होना चाहिए। कथन 3 पूरी तरह सही है, क्योंकि अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के संवैधानिक कर्तव्यों को परिभाषित करता है जिसके तहत उसे राज्य के प्रशासनिक और विधायी निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देनी होती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्यायों को पढ़ें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के सदनों की विधाई शक्तियों, धन विधेयकों (Money Bills) और दोनों सदनों के बीच गतिरोध की प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 198 के अनुसार धन विधेयक केवल विधानसभा (Legislative Assembly) में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, विधान परिषद में नहीं; और विधान परिषद को धन विधेयक प्राप्ति के पश्चात अधिकतम चौदह दिनों की समयावधि के भीतर अपनी सिफारिशों सहित या बिना सिफारिशों के विधानसभा को वापस लौटाना अनिवार्य होता है, तथा यदि विधान परिषद इस अवधि के भीतर विधेयक नहीं लौटती है, तो वह दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
2. यदि किसी साधारण विधेयक को विधानसभा द्वारा पारित करके विधान परिषद में भेजा जाता है और विधान परिषद उस विधेयक को अस्वीकार कर देती है या ऐसे संशोधनों को पारित करती है जिससे विधानसभा सहमत नहीं है, अथवा विधान परिषद द्वारा विधेयक प्राप्ति की तारीख से तीन माह बीत जाने के बाद भी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जाता है, तो विधानसभा उस विधेयक को पुनः पारित कर सकती है और विधान परिषद की सहमति के बिना उसे राज्यपाल की अनुमति के लिए प्रस्तुत कर सकती है।
3. भारतीय संविधान में संसद के सदनों की भांति राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों (विधानसभा और विधान परिषद) के बीच विधाई गतिरोध को सुलझाने के लिए अनुच्छेद 197 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान किया गया है, जिसकी अध्यक्षता संबंधित राज्य के विधान परिषद के सभापति द्वारा की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल की शक्तियों, विशेषकर अध्यादेश निर्माण (अनुच्छेद 213) और मुख्यमंत्री की नियुक्ति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की वही शक्ति और प्रभाव होता है जो राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी अधिनियम का होता है, किंतु इसके लिए आवश्यक है कि राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग अपने स्वविवेक से करे, भले ही इसके लिए उसे मंत्रिपरिषद से परामर्श न लेना पड़े।
2. राज्यपाल द्वारा जारी प्रत्येक अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के पुनर्गठन या सत्रारंभ होने के पश्चात विधानमंडल के समक्ष रखना अनिवार्य है, और यदि विधानमंडल उस पर कोई संकल्प पारित नहीं करता है, तो वह अध्यादेश विधानमंडल के पुनर्समवेत होने से छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने पर निष्प्रभावी हो जाता है।
3. राज्य में मुख्यमंत्री की नियुक्ति के संबंध में राज्यपाल को पारंपरिक रूप से यह विवेकाधिकार प्राप्त है कि यदि किसी भी दल या गठबंधन को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो, तो वह सरकार गठन के लिए सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता को आमंत्रित करने में अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक विवेक बुद्धि का प्रयोग कर सकता है, और इस प्रकार नियुक्त मुख्यमंत्री को एक निश्चित समयावधि के भीतर सदन में अपना बहुमत सिद्ध करना होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता, क्षेत्राधिकार तथा अधीनस्थ न्यायपालिका के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ किसी अन्य प्रयोजन के लिए भी रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और इस संदर्भ में उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का क्षेत्र सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में अधिक विस्तृत है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के उल्लंघन पर ही अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी कर सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 219 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश अपना पद ग्रहण करने से पहले राज्य के राज्यपाल या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ या प्रतिज्ञान करता है।
3. जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात की जाती है, किंतु किसी राज्य की न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीशों के अलावा अन्य व्यक्तियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा सीधे राज्य लोक सेवा आयोग के परामर्श से की जाती है, जिसमें उच्च न्यायालय की कोई भूमिका नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और सदनों की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार, धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है और राज्यसभा इस पर किसी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकती है, किंतु यदि राज्यसभा धन विधेयक को 14 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ वापस नहीं करती है, तो उसे दोनों सदनों द्वारा पारित नहीं माना जाएगा और वह विधेयक लैप्स हो जाएगा।
2. लोकसभा और राज्यसभा के बीच गतिरोध की स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आहूत कर सकता है, जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है, और इस संयुक्त बैठक में यदि विधेयक उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से पारित हो जाता है, तो उसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
3. संविधान संशोधन विधेयक (Constitution Amendment Bill) के मामले में दोनों सदनों के बीच असहमति होने पर अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक बुलाए जाने का प्रावधान नहीं है, तथा ऐसे प्रत्येक संविधान संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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