त्वरित लिंक्स
Indian Polity
13 views
भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) तथा अधीनस्थ न्यायपालिका से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ 'किसी अन्य प्रयोजन' के लिए भी अपने प्रादेशिक क्षेत्र के भीतर किसी व्यक्ति, प्राधिकारी या सरकार को रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और उच्च न्यायालय की यह रिट अधिकारिता उच्चतम न्यायालय की अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट अधिकारिता की तुलना में अधिक विस्तृत (Wider) है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 227 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर आने वाले सभी न्यायालयों और अधिकरणों (ट्रिब्यूनल) पर अधीक्षण की शक्ति प्राप्त है, और इस शक्ति के अंतर्गत उच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए भी अधीनस्थ न्यायपालिका के प्रशासनिक और न्यायिक कामकाज की निगरानी कर सकता है।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 233क के अंतर्गत राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग या पदोन्नति से संबंधित यदि कोई पूर्ववर्ती या भूतलक्षी (Retrospective) कार्रवाई उच्च न्यायालय से परामर्श किए बिना भी की गई हो, तो वह केवल इस आधार पर अवैध या शून्य घोषित नहीं की जा सकती है यदि उसमें अन्य सभी संवैधानिक औपचारिकताओं का पालन किया गया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही नहीं, बल्कि किसी अन्य विधिक अधिकार या प्रयोजन के लिए भी रिट जारी कर सकता है। अतः उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) की तुलना में व्यापक है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 227 के तहत उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक क्षेत्र के सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण (Superintendence) की व्यापक शक्ति प्राप्त है, जिसका प्रयोग वह प्रशासनिक और न्यायिक दोनों ही रूपों में (स्वतः संज्ञान लेकर भी) कर सकता है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 233क (जिसे 20वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1966 द्वारा जोड़ा गया था) के अनुसार जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति या उससे जुड़ी कार्रवाइयाँ उच्च न्यायालय से परामर्श किए बिना अवैध मानी जाती थीं, और इस अनुच्छेद ने कुछ भूतलक्षी मामलों को वैध बनाया था, किंतु वर्तमान में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय से परामर्श करना अनिवार्य है और परामर्श के बिना की गई नियुक्तियाँ असंवैधानिक होती हैं। अधिक जानने के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
Related Questions
→
प्रकृति में सबसे सशक्त बल है?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायपालिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक अधिकारक्षेत्र के सभी न्यायालयों और अधिकरणों (सैन्य अधिकरणों को छोड़कर) पर अधीक्षण (Superintendence) करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति केवल न्यायिक अधीक्षण तक सीमित है, प्रशासनिक अधीक्षण तक इसका विस्तार नहीं होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के अंतर्गत जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात की जाती है, तथा किसी व्यक्ति को जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए यह अनिवार्य है कि वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता या प्लीडर रहा हो और संघ या राज्य की सेवा में पहले से कार्यरत न हो।
3. संविधान के अनुच्छेद 236 के निर्वचन के अनुसार 'जिला न्यायाधीश' के अंतर्गत नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघु वाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य presidency मजिस्ट्रेट और सेशन न्यायाधीश सभी शामिल होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा व राज्यसभा की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अंतर्गत धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है और राज्यसभा इसे अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती है, तथा राज्यसभा को इस पर अपनी सिफारिशें देने के लिए अधिकतम 14 दिनों का समय मिलता है, जिसे यदि राज्यसभा उस अवधि में नहीं लौटाती है, तो उस विधेयक को दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह लोकसभा द्वारा पारित किया गया था।
2. अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति द्वारा आहूत की जाने वाली दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष या राज्यसभा का उपसभापति (उस क्रम में) इस बैठक की अध्यक्षता करता है, किंतु यदि ये सभी अनुपस्थित हों, तो उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से चुने गए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इसकी अध्यक्षता की जा सकती है।
3. संविधान संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment Bill), जो अनुच्छेद 368 के तहत लाया जाता है, के संबंध में लोकसभा और राज्यसभा दोनों को समान शक्तियाँ प्राप्त हैं, और ऐसे किसी विधेयक पर दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न होने पर अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक बुलाए जाने का प्रावधान स्पष्ट रूप से संविधान में किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा तथा राज्यसभा के विधाई विशेषाधिकारों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अंतर्गत संसद में पुनः स्थापित किए जाने वाले विधेयकों के संदर्भ में, लोकसभा के विघटन पर राज्यसभा में लंबित ऐसा विधेयक जो लोकसभा द्वारा पारित नहीं किया गया हो, वह व्यपगत (Lapse) नहीं होता है, किंतु यदि कोई विधेयक लोकसभा द्वारा पारित कर दिया गया है और वह राज्यसभा में विचारधीन है, तो लोकसभा के विघटन के साथ वह विधेयक स्वतः व्यपगत हो जाता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 100 के अनुसार संसद के दोनों सदनों की बैठकों में कोरम (गणपूर्ति) कुल सदस्य संख्या का दसवां हिस्सा (यानि 10 प्रतिशत) निर्धारित किया गया है, और यदि सदन की बैठक के दौरान कोरम पूरा नहीं होता है, तो पीठासीन अधिकारी का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह सदन को स्थगित कर दे या बैठक को तब तक के लिए निलंबित कर दे जब तक कोरम पूरा न हो जाए।
3. अनुच्छेद 105 के अंतर्गत संसद के दोनों सदनों को और उनके सदस्यों को मिलने वाले संसदीय विशेषाधिकारों के तहत, यदि कोई सदन अपने विशेषाधिकार हनन के मामले में किसी व्यक्ति को दंडित करता है, तो उस दंडात्मक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है, क्योंकि आंतरिक विधायी कार्यवाहियाँ पूर्णतः न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर होती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble) और उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत और 22 जनवरी 1947 को स्वीकृत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objective Resolution) ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार बना, तथा इसमें भारत को एक 'संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य' घोषित करने का मूल संकल्प व्यक्त किया गया था।
2. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूसी क्रांति (1917) से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया है, जबकि 'स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व' के आदर्शों को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिया गया है।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है, और यद्यपि इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जा सकता है, किंतु इसके 'मूल ढांचे' (Basic Structure) को संशोधित या नष्ट नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.