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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी शक्तियों और अध्यादेश जारी करने की शक्ति (अनुच्छेद 123) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण की शक्ति संसद की विधि बनाने की शक्ति के सह-विस्तारित (Co-extensive) है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति केवल उन्हीं विषयों पर अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है जिन पर संसद को कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 123 के अधीन प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश को संसद के पुनः समवेत होने पर उसके दोनों सदनों के समक्ष रखना अनिवार्य है, और यदि संसद उस अध्यादेश को बिना अनुमोदन के अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित कर देती है, तो वह संसद के पुनः समवेत होने के ठीक छह सप्ताह बाद स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है, भले ही उसकी अधिकतम अवधि (छह महीने और छह सप्ताह) समाप्त न हुई हो।
  3. 3. 'कुपन्ना स्वामी वाद (1970)' और 'डी.सी. वाधवा वाद (1987)' में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि अध्यादेश जारी करने की शक्ति का बार-बार बिना विधानसभा या संसद की बैठक बुलाए उपयोग करना (अध्यादेश संस्कृति) संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक जवाबदेह शासन प्रणाली के प्रतिकूल है तथा यह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है क्योंकि यह राष्ट्रपति का विशेषाधिकार है।
  4. 4. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश प्रख्यापित करने के संतुष्टि बोध (Satisfaction) का न्यायिक पुनरावलोकन पूर्णतः वर्जित है, और इसे किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह संतुष्टि सद्भावनापूर्ण नहीं थी या अपर्याप्त सामग्री पर आधारित थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति संसद की विधायी शक्ति के सह-विस्तारित होती है यानी जिन विषयों पर संसद कानून बना सकती है, राष्ट्रपति उन्हीं विषयों पर अध्यादेश ला सकता है। कथन 2 सही है; अध्यादेश को संसद के पुनः बैठने पर दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना अनिवार्य है और यदि संसद इसे अस्वीकृत कर दे तो यह छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पहले ही (या छह सप्ताह के भीतर) निष्प्रभावी हो जाता है। कथन 3 गलत है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने डी.सी. वाधवा वाद (1987) में स्पष्ट किया था कि अध्यादेश निर्माण की शक्ति न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है और बार-बार अध्यादेश लाना असंवैधानिक है। कथन 4 भी गलत है क्योंकि 38वें संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति की संतुष्टि को न्यायालय में चुनौती देने से रोका गया था, किंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा इस प्रावधान को हटा दिया गया, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने के निर्णय का न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है यदि वह मालाफाइड (दुराशय) पर आधारित हो। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर अध्ययन करें।
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