BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
17 views

भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और सदनों की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं; और यदि राज्यसभा किसी धन विधेयक को बिना किसी संशोधन के लौटा देती है या चौदह दिन की समयावधि बीत जाती है, तो वह विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है, भले ही राज्यसभा ने उस पर औपचारिक मतदान न किया हो।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) केवल साधारण विधेयकों और वित्तीय विधेयकों (श्रेणी-I) के मामलों में ही आहत कर सकता है, जबकि संविधान संशोधन विधेयकों तथा धन विधेयकों के संदर्भ में संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
  3. 3. लोकसभा द्वारा पारित और राज्यसभा को प्रेषित किसी साधारण विधेयक के संबंध में यदि दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न होता है और राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुलाने की मंशा की सूचना दे देता है, तो राज्यसभा द्वारा विधेयक को छह महीने तक रोक लेने की स्थिति में ही संयुक्त बैठक आहूत की जा सकती है, भले ही इस अवधि के दौरान लोकसभा विघटित हो गई हो।
  4. 4. संसद में विधाई प्रक्रिया के दौरान यदि कोई विधेयक लोकसभा में लंबित है और लोकसभा के विघटन के कारण वह व्यपगत (Lapse) हो जाता है, किंतु राष्ट्रपति ने उसके संबंध में संयुक्त बैठक बुलाने की अपनी मंशा अधिसूचित कर दी है, तो ऐसा विधेयक व्यपगत नहीं होगा और वह संयुक्त बैठक में विचार के लिए जीवित बना रहेगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश हो सकता है और राज्यसभा इसे अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है। यदि इस अवधि में राज्यसभा इसे वापस नहीं करती, तो दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है। कथन 2 सही है क्योंकि अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक केवल साधारण और वित्तीय विधेयकों के लिए बुलाई जा सकती है, संविधान संशोधन और धन विधेयकों के लिए नहीं। कथन 3 गलत है क्योंकि यदि लोकसभा विघटित हो जाती है, तो दोनों सदनों के बीच गतिरोध समाप्त हो जाता है और संयुक्त बैठक का प्रावधान व्यपगत हो जाता है। कथन 4 गलत है क्योंकि लोकसभा के विघटन से लोकसभा में लंबित विधेयक व्यपगत हो जाते हैं, और संयुक्त बैठक की अधिसूचना के बावजूद वे समाप्त हो जाते हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
Share:

Related Questions

भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत नगरपालिकाओं की वित्तीय शक्तियों, कर-रोपण और वित्त आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 243-Y के प्रावधानों के तहत राज्य का वित्त आयोग, जो अनुच्छेद 243-I के अंतर्गत गठित किया जाता है, नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है और राज्यपाल को ऐसे सिद्धांतों की संस्तुति करता है जो नगरपालिकाओं द्वारा लगाए जाने वाले करों, शुल्कों, टोल और फीसों के निर्धारण तथा राज्य द्वारा संचित निधि से दिए जाने वाले सहायता-अनुदान (Grants-in-aid) को विनियमित करते हैं। 2. अनुच्छेद 243-X के अधीन राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा किसी नगरपालिका को उसके द्वारा संग्रहित और विनियोजित किए जाने वाले करों, शुल्कों, टोल और फीसों के अधिरोपण और संग्रहण के लिए अधिकृत कर सकता है, किंतु इसके लिए यह अनिवार्य है कि ऐसे कर केवल केंद्रीय सूची या समवर्ती सूची के विषयों पर ही आधारित होने चाहिए, राज्य सूची पर नहीं। 3. सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों और संवैधानिक उपबंधों के अनुसार, राज्य के वित्त आयोग द्वारा नगरपालिकाओं के संबंध में दी गई संस्तुतियों को राज्य सरकार के लिए अनिवार्य रूप से लागू करना बाध्यकारी होता है, और राज्य सरकार बिना किसी वैधानिक संशोधन के इनमें अपनी मर्जी से कोई फेरबदल नहीं कर सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक पदों, अधिकारों और कृत्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, तथा उसके लिए यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य है कि वह अपने पद पर रहते हुए किसी भी आपराधिक मामले या निजी प्रैक्टिस में भारत सरकार के विरुद्ध विधिक सलाह न दे। 2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को भारत के संचित निधि से किए जाने वाले सभी व्ययों की लेखापरीक्षा करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु उसे राज्यों की संचित निधियों से होने वाले व्ययों की लेखापरीक्षा करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है, क्योंकि राज्यों के लेखाओं का परीक्षण संबंधित राज्य के महालेखाकार द्वारा किया जाता है। 3. महान्यायवादी को संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार प्राप्त है, किंतु उसे मतदान करने का कोई अधिकार नहीं है; जबकि CAG संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के एक 'मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक' (Friend, Philosopher and Guide) के रूप में कार्य करता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन हर कितने वर्षों पर होता है? भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) और अधीनस्थ न्यायपालिका के प्रशासनिक नियंत्रण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की जो शक्ति प्राप्त है, वह न केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बल्कि 'अन्य प्रयोजनों' (जैसे कि साधारण विधिक अधिकारों के उल्लंघन पर) के लिए भी प्रयोग की जा सकती है, और इस दृष्टि से उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट क्षेत्राधिकार की तुलना में अधिक विस्तृत है। 2. संविधान के अनुच्छेद 233 के प्रावधानों के अंतर्गत किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा उस राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात ही की जाती है, और इसमें उच्च न्यायालय की सहमति अनिवार्य होती है। 3. संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत राज्य के सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों के नीचे के न्यायालयों के अधिकारियों की पोस्टिंग, प्रमोशन, पदस्थापन और अनुशासनिक नियंत्रण शामिल है, पूर्णतः संबंधित राज्य सरकार (राज्यपाल) के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार में निहित होता है, और इसमें उच्च न्यायालय की कोई प्रशासनिक भूमिका नहीं होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? अनुच्छेद 44 क्या है?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.