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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 18 के तहत उपाधियों का अंत किया गया है, जिसके अंतर्गत राज्य सेना या विद्या संबंधी सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा, तथा भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकता है।
  2. 2. 'बाल कृष्ण बनाम भारत संघ वाद' और 'इंदिरा साहनी वाद' में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 18 के तहत दी जाने वाली 'भारत रत्न', 'पद्म विभूषण', 'पद्म भूषण' और 'पद्म श्री' जैसी राष्ट्रीय उपाधियाँ अनुच्छेद 18(1) के अर्थ के अंतर्गत 'उपादियाँ' (Titles) हैं, इसलिए इनका प्रयोग व्यक्तियों द्वारा अपने नाम के पहले या बाद में प्रत्यय या उपसर्ग के रूप में किया जा सकता है।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अनुसार किसी भी अपराध के लिए अभियुक्त किसी व्यक्ति को अपने ही विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य (Self-incrimination) नहीं किया जाएगा, और यह संरक्षण केवल आपराधिक न्यायालयों की कार्यवाहियों तक ही सीमित है, विभागीय या प्रशासनिक जाँच के दौरान यह लागू नहीं होता है।
  4. 4. अनुच्छेद 21 के अंतर्गत 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण' प्रदान किया गया है, जिसके दायरे में 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) को 'पुट्टास्वामी वाद (2017)' में नौ जजों की पीठ द्वारा संविधान के अनुच्छेद 21 तथा भाग III के अन्य अनुच्छेदों के तहत एक मूल अधिकार घोषित किया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 18 के तहत सेना या विद्या संबंधी सम्मान को छोड़कर उपाधियों का अंत कर दिया गया है और विदेशी राज्य से उपाधि लेने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति अनिवार्य है। कथन 2 गलत है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने 'बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996)' वाद में यह स्पष्ट किया था कि 'भारत रत्न', 'पद्म विभूषण' आदि उपाधियाँ नहीं बल्कि राष्ट्रीय पुरस्कार (Awards) हैं, और इनका प्रयोग recipient द्वारा अपने नाम के आगे या पीछे उपसर्ग/प्रत्यय (Title) के रूप में नहीं किया जा सकता है। कथन 3 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-अभिशंसन से संरक्षण (Protection against self-incrimination) का सिद्धांत आपराधिक न्यायालयों की कार्यवाहियों के साथ-साथ कुछ हद तक औपचारिक आपराधिक जाँच और समरूप कार्यवाहियों पर भी लागू होता है, केवल विभागीय जाँच पूरी तरह बाहर नहीं है। कथन 4 सही है, क्योंकि 'के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017)' के ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार माना है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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