History of India
Asked 2 hours ago · Viewed 0 times
सिंधु घाटी सभ्यता की सामाजिक, आर्थिक और नगरीय व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. हड़प्पा सभ्यता की लिपि मुख्य रूप से 'चित्रात्मक' (Pictographic) थी, जो आमतौर पर दाईं से बाईं ओर (बुस्ट्राफेडन शैली में) लिखी जाती थी, और इस लिपि के सबसे लंबे अभिलेख में लगभग 26 संकेत एक साथ पाए गए हैं।
- 2. लोथल और चन्हूदारो दोनों ही स्थलों से मनके (Beads) बनाने के कारखाने के अवशेष मिले हैं, जहाँ कारेलियन, लापीस लाजुली और जैस्पर जैसे बहुमूल्य पत्थरों का उपयोग करके आभूषण तैयार किए जाते थे।
- 3. मोहनजोदड़ो से प्राप्त 'पशुपतिनाथ' (प्रोटो-शिव) की मुहर पर भगवान शिव को योगमुद्रा में बैठा हुआ दिखाया गया है, जिसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा तथा सिंहासन के नीचे दो हिरण उत्कीर्ण हैं।
- 4. सिंधु घाटी सभ्यता के लोग लोहे की धातु से पूरी तरह परिचित थे और उन्होंने अपने कृषि उपकरणों, अस्त्र-शस्त्रों तथा व्यापारिक वस्तुओं के निर्माण में बड़े पैमाने पर लोहे की बनी वस्तुओं का उपयोग किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
सिंधु घाटी सभ्यता कांस्य युगीन (Bronze Age) सभ्यता थी, और इसके लोग तांबे और टिन को मिलाकर कांसा बनाते थे। सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों को लोहे की धातु का कोई ज्ञान नहीं था; भारत में लोहे का प्रारंभिक साक्ष्य उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व) के दौरान अतरंजीखेड़ा से मिलता है। अतः कथन 4 गलत है। अन्य सभी कथन (1, 2 और 3) सिंधु घाटी सभ्यता (विकिपीडिया संदर्भ) के पुरातात्विक साक्ष्यों, लिपि की विशेषताओं, शिल्प उद्योगों और धार्मिक मान्यताओं के संदर्भ में पूर्णतः सत्य हैं।
अगला प्रश्न →
दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक, आर्थिक और सैन्य सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित…
← पिछला प्रश्न
वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान बिहार में बाबू वीर…
Related Questions
→
मध्यकालीन भारत के इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों के वैचारिक विकास, प्रमुख संतों और उनकी दार्शनिक प्रणालियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित 'अद्वैत वेदांत' दर्शन के विपरीत, दक्षिण भारत के अलवार (वैष्णव) और नयनार (शैव) संतों ने भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाया, जिसमें बारहवीं शताब्दी में रामानुज ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन का प्रतिपादन करते हुए ईश्वर के साथ जीव के गुणात्मक अभेद किंतु सत्तात्मक भेद का सिद्धांत दिया।
2. पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन को प्रसारित करने वाले रामानंद ने जाति और वर्ण व्यवस्था की कठोरता का विरोध करते हुए अपने शिष्यों में रैदास (चमार), कबीर (जुलाहा), सेना (नाई) और पीपा (राजपूत) जैसे समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को सम्मिलित किया था।
3. सूफी मत के 'चिशती सिलसिला' के संस्थापक भारत में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती थे, जिनकी दरगाह अजमेर में स्थित है, तथा इस सिलसिले के संतों ने राज्य की राजनीति से पूरी तरह दूरी बनाए रखने की नीति का कड़ाई से पालन किया और सुल्तानों या दरबारियों से किसी भी प्रकार के राजकीय अनुदान या जागीर को स्वीकार करने से स्पष्ट इंकार कर दिया था।
4. सूफ़ियों की 'सुहरावर्दी सिलसिला' के संत ख्वाजा बख्तियार काकी और शेख निजामुद्दीन औलिया थे, जिन्होंने सल्तनत काल के दौरान दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों के साथ घनिष्ठ संबंध रखे और अमीर खुसरो जैसे महान संगीतकार व कवि शेख निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्यों में से एक थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था, भूमि अनुदान व्यवस्था और प्रशासनिक शब्दावली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गुप्त काल में भूमि के वर्गीकरण के तहत 'क्षेत्र' वह भूमि थी जो खेती के योग्य होती थी, 'अपर्हत' बिना जोती गई जंगली भूमि थी, और 'वास्तुल' निवास योग्य भूमि को कहा जाता था।
2. इस काल में राजाओं द्वारा ब्राह्मणों, मंदिरों और बौद्ध विहारों को दिए जाने वाले कर-मुक्त भूमि अनुदान की परंपरा का व्यापक विस्तार हुआ, जिसे 'अग्रहार' अनुदान कहा जाता था, जिसके तहत अनुदान प्राप्तकर्ताओं को प्रशासनिक और न्यायिक अधिकार भी सौंप दिए जाते थे।
3. गुप्तकालीन अभिलेखों में भूमि के क्रय-विक्रय और पंजीयन के कार्यों का उल्लेख मिलता है, जहाँ नगर या जिला प्रशासन के स्तर पर 'पुस्तपाल' (लेखपाल या अभिलेख अधिकारी) नामक अधिकारी भूमि के रिकॉर्ड और दस्तावेजों की देखरेख करता था।
4. गुप्त सम्राटों ने अपने शासनकाल में केवल सोने के सिक्के (दिनार) और तांबे के सिक्के ही भारी मात्रा में जारी किए, तथा उन्होंने सातवाहन राजवंश की तरह बड़ी मात्रा में सीसे और पोटीन के सिक्कों का प्रचलन जारी रखकर व्यापारिक सुगमता को बढ़ावा दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मुगलकालीन केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मुगल केंद्रीय प्रशासन में 'मीर बख्शी' सैन्य विभाग का प्रमुख होने के साथ-साथ खुफिया और सूचना विभाग (वाकिआ नवीस) का भी प्रभारी था, तथा वह मनसबदारों की नियुक्ति के लिए सम्राट को अनुशंसा भेजने से पहले उनके घोड़ों और सैनिकों के निरीक्षण (दाग एवं हुलिया) का कार्य भी संभालता था।
2. जहाँगीर के शासनकाल में मनसबदारी प्रथा के अंतर्गत बिना 'जात' पद बढ़ाए मनसबदारों को अतिरिक्त सवार सैनिकों की संख्या रखने की अनुमति देने वाली 'दुअस्पा-सिंहअस्पा' (Du-aspa Sih-aspa) प्रणाली की शुरुआत की गई थी।
3. शाहजहां के शासनकाल में मनसबदारी व्यवस्था के अंतर्गत 'माहवार' (Month-scale) प्रणाली की शुरुआत की गई, जिसके तहत जागीरों से होने वाली वास्तविक राजस्व प्राप्ति में कमी आने के कारण वेतन को छमाही या तिमाही महीनों के अनुपात में घटा दिया गया था।
4. औरंगजेब के शासनकाल में दक्कन के लंबे अभियानों के कारण मनसबदारों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो गई, जिसके परिणामस्वरूप उपलब्ध जागीरों की तुलना में दावेदारों की संख्या बहुत अधिक हो गई और इस गंभीर प्रशासनिक संकट को 'जागीरदारी संकट' (Crisis of Jagirs) कहा जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व व्यवस्थाओं (स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा 1793 में लागू किए गए 'स्थाई बंदोबस्त' (Permanent Settlement) के तहत जमींदारों को भूमि का पूर्ण स्वामी मान लिया गया, जिन्हें ब्रिटिश सरकार को एक निश्चित भू-राजस्व का 10/11 भाग देना होता था, जबकि शेष 1/11 भाग उनके प्रशासनिक खर्च और लाभ के रूप में सुरक्षित रहता था।
2. मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में मुख्य रूप से लागू 'रयतवारी व्यवस्था' (Ryotwari System) के प्रणेता थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड थे, जिसमें बिचौलियों (जमींदारों) को पूरी तरह समाप्त कर सीधे किसानों (रयतों) को भू-स्वामी माना गया और सरकार द्वारा राजस्व का निर्धारण सीधे उनसे किया गया।
3. उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू 'महालवारी व्यवस्था' (Mahalwari System) के अंतर्गत भू-राजस्व के आकलन और संग्रह के लिए व्यक्तिगत किसानों या जमींदारों के बजाय संपूर्ण गाँव या 'महाल' (गाँव के समूह) को एक इकाई माना गया, जिसके लिए पूरे ग्राम समुदाय को सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाया गया था।
4. इन तीनों प्रमुख भू-राजस्व प्रणालियों में से 'स्थाई बंदोबस्त' ब्रिटिश भारत के कुल भू-भाग के सर्वाधिक क्षेत्रफल (लगभग 51%) पर लागू की गई थी, जबकि रयतवारी व्यवस्था सबसे कम क्षेत्रफल पर लागू थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
→
महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.