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History of India
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मध्यकालीन भारत के भक्ति और सूफी आंदोलनों के वैचारिक विकास, प्रमुख संप्रदायों और उनके दार्शनिक सिद्धांतों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित 'अद्वैत वेदांत' के विपरीत, दक्षिण भारत के वैष्णव संत रामानुज ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार ब्रह्म और जीव में भेद होते हुए भी जीव ब्रह्म का ही एक अंश है, और मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रपत्ति (पूर्ण आत्मसमर्पण) मार्ग पर विशेष बल दिया गया।
  2. 2. सूफी सिलसिले में 'बेशरा' (Besharah) वे संत थे जो इस्लामिक कानून 'शरियत' के कठोर बंधनों का पूर्ण रूप से पालन करते थे और राज्य के राजनीतिक मामलों में सक्रिय भागीदारी निभाते थे, जबकि 'बाशरा' (Basharah) संत शरियत से स्वतंत्र यानी मस्त कलंदर की तरह आचरण करते थे।
  3. 3. बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में बसवन्ना द्वारा प्रारंभ किए गए 'वीरशैव' (लिंगायत) आंदोलन ने जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवादी संस्कारों और पुनर्जन्म के सिद्धांत को अस्वीकार करते हुए शिव की उपासना को केंद्र में रखा और लिंग धारण करने की प्रथा को बढ़ावा दिया।
  4. 4. सूफी संत शेख मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा भारत में चिश्ती सिलसिले की नींव रखी गई, और इस सिलसिले के अंतर्गत संगीत गोष्ठियों को 'समां' (Sama) कहा जाता था, जिसे आध्यात्मिक चेतना जगाने का एक प्रमुख माध्यम माना गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन का प्रतिपादन किया था जिसमें भक्ति और प्रपत्ति (आत्मसमर्पण) पर जोर दिया गया। कथन 2 गलत है क्योंकि इसके विपरीत 'बाशरा' वे सूफी संत थे जो शरियत (इस्लामिक कानून) का सख्ती से पालन करते थे (जैसे चिश्ती और सुहरावर्दी), जबकि 'बेशरा' (मस्त कलंदर) संत शरियत के बंधनों से मुक्त माने जाते थे। कथन 3 सही है; बसवन्ना द्वारा 12वीं शताब्दी में वीरशैव या लिंगायत आंदोलन की शुरुआत की गई थी जो जाति व्यवस्था और कर्मकांड के विरोधी थे। कथन 4 सही है, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने भारत में चिश्ती सिलसिले की स्थापना की और 'समां' (संगीत) उनकी साधना का एक महत्वपूर्ण अंग था। इस विषय के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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