BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Civil services
20 views

अशोक के 'कलिंग विजय' का उल्लेख किस शिलालेख में मिलता है?

Detailed Explanation

अशोक के 13वें शिलालेख में कलिंग युद्ध और विजय का विस्तृत वर्णन है।
Share:

Related Questions

→ भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत की गई थी, और यह भारत का पहला ऐसा विशेष न्यायिक निकाय है जिसे पर्यावरण से संबंधित किसी भी सिविल मामले में उच्च न्यायालयों की तरह 'मूल क्षेत्राधिकार' (Original Jurisdiction) का प्रयोग करने की शक्ति प्राप्त है। 2. NGT के अध्यक्ष (Chairperson) और न्यायिक सदस्यों (Judicial Members) की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) के साथ परामर्श के पश्चात केंद्र सरकार द्वारा की जाती है, तथा NGT के Chairperson के रूप में केवल सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही नियुक्त किया जा सकता है। 3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, NGT पर्यावरण से संबंधित मामलों की सुनवाई करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के सख्त नियमों से बंधा नहीं होता है, बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है, तथा NGT के आदेशों या निर्णयों के विरुद्ध केवल उच्चतम न्यायालय में ही सीधे अपील की जा सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → मिस्र की राजधानी काहिरा किस नदी के किनारे स्थित है? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 105' (সংসद् के सदनों की, तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों आदि से संबंधित) के अंतर्गत संसदीय विशेषाधिकारों (Parliamentary Privileges) और उनके न्यायिक आयामों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 105 के खंड (3) के अनुसार, संसद के प्रत्येक सदन और उसके सदस्यों तथा समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां वही होंगी जो समय-समय पर संसद द्वारा विधि द्वारा निर्धारित की जाती हैं, और यदि संसद कोई ऐसा कानून नहीं बनाती है, तो वे वही होंगी जो 44वें संविधान संशोधन, 1978 के लागू होने के ठीक पहले ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स (House of Commons) के पास थीं। 2. ऐतिहासिक 'के. केसवन बनाम मेनका गांधी वाद' (या 'पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम सीबीआई वाद, 1998') में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अंतर्गत संसद के भीतर किसी बात को कहने या किसी मत देने के संबंध में सदस्यों को प्राप्त प्रतिरक्षा (Immunity) उन मामलों में भी लागू होती है जहाँ किसी सांसद पर रिश्वत लेने का गंभीर आरोप हो। 3. संसदीय विशेषाधिकारों और मौलिक अधिकारों के संघर्ष के संबंध में, उच्चतम न्यायालय ने 'केशव सिंह वाद (उत्तर प्रदेश विधानसभा मामला, 1965)' में यह निर्धारित किया था कि यदि संसद या राज्य विधानमंडल अपने किसी विशेषाधिकार हनन के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करता है, तो न्यायपालिका को उस व्यक्ति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका के तहत उस दंडात्मक आदेश की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 324' के अंतर्गत 'भारत के निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) की संरचना, स्वतंत्रता और शक्तियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुसार, निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय (Multi-member body) है जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने ही अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं जितने समय-समय पर राष्ट्रपति द्वारा तय किए जाते हैं, और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति अनिवार्य रूप से मुख्य निर्वाचन आयुक्त की पूर्व सहमति के आधार पर ही की जाती है। 2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए लागू होते हैं, जबकि अन्य किसी भी निर्वाचन आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना उसके पद से नहीं हटाया जा सकता है। 3. निर्वाचन आयोग को संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है, किंतु पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों के संचालन और अधीक्षण की शक्ति केवल निर्वाचन आयोग के पास ही होती है, राज्य निर्वाचन आयोगों का इसमें कोई अधिकार नहीं होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) और उसकी न्यायिक समीक्षा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति कार्यपालिका की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है, जिसका प्रयोग वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना अपने स्वविवेक से कर सकती है। 2. 'एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) बनाम भारत संघ' या ऐतिहासिक 'ईश्वर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' तथा 'केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989)' मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति की न्यायिक समीक्षा पूरी तरह से वर्जित है और इसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 3. सर्वोच्च न्यायालय ने हाल के निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है कि यदि राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका पर निर्णय लेने में अत्यधिक, अनपेक्षित और अमानवीय देरी की जाती है, तो इस प्रक्रियागत देरी (Procedural Delay) के आधार पर मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.