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कांग्रेस की स्थापना के समय भारत का वायसराय कौन था?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
1885 में कांग्रेस की स्थापना के समय भारत का वायसराय लॉर्ड डफरिन था।
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World Intangible Investment Report 2026 के अनुसार, अमूर्त निवेश (Intangible Investment) में सबसे तेज़ वृद्धि दर्ज करने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था कौन-सी रही?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत संविधान संशोधन की प्रक्रिया और इसके न्यायिक पुनरावलोकन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 368 संसद को इस संविधान के किसी भी उपबंध का संशोधन करने की शक्ति प्रदान करता है, जिसे संसद द्वारा अपनी संविधान-संशोधन की सामान्य विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही पारित किया जा सकता है, बशर्ते वह संशोधन संघीय ढांचे से संबंधित न हो।
2. ऐतिहासिक 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया था कि संसद की संविधान संशोधन की शक्ति असीमित नहीं है और वह अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) को नष्ट या क्षीण करने वाला संशोधन नहीं कर सकती है।
3. 'मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)' वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि संविधान के भाग-III (मौलिक अधिकार) और भाग-IV (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) के बीच संतुलन संविधान के मूल ढांचे का एक अनिवार्य हिस्सा है, और संसद द्वारा अनुच्छेद 368 में किए गए वे संशोधन जो न्यायिक समीक्षा की शक्ति को पूरी तरह समाप्त करते हैं, असंवैधानिक घोषित किए जाएंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' (संघ - अनुच्छेद 52 से 151) के अंतर्गत 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General of India) और 'महाधिवक्ता' (Solicitor General) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति ऐसे व्यक्ति को की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्ह (Qualified) हो, और महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त होता है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में भाग लेने और बोलने का अधिकार है, किंतु उसे मतदान करने का कोई अधिकार नहीं होता है।
2. भारतीय संविधान के मूल पाठ में 'महाधिवक्ता' (Solicitor General of India) और अन्य 'अतिरिक्त महाधिवक्ताओं' (Additional Solicitors General) के पदों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है, जो महान्यायवादी को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता प्रदान करते हैं, तथा ये सभी अधिकारी संघीय मंत्रिमंडल के राजनीतिक निर्णयों के तहत नियुक्त किए जाते हैं और सरकार बदलने पर इन्हें अनिवार्य रूप से इस्तीफा देना पड़ता है।
3. महान्यायवादी को अपने निजी विधिक अभ्यास (Private Legal Practice) से वंचित नहीं किया जाता है, बशर्ते कि वह जिस मामले में भारत सरकार के खिलाफ या ऐसे मामले में जिसमें भारत सरकार की रुचि हो, कोई सलाह या वकालत न करे, और वह संसद की किसी समिति का सदस्य भी बनाया जा सकता है, किंतु उसे उस समिति में भी मतदान करने का कोई अधिकार नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की 'क्षमादान की शक्ति' और इसकी राष्ट्रपति की शक्ति के साथ तुलना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिस तक राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है।
2. राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों की क्षमादान शक्तियों में एक मुख्य अंतर यह है कि राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामले में क्षमादान की शक्ति प्राप्त है, जबकि राज्यपाल को यह शक्ति प्राप्त नहीं है।
3. राज्यपाल को मृत्युदंड (Death Sentence) के मामले में क्षमादान देने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है, भले ही राज्यपाल उसे पूरी तरह से माफ (Pardon) न कर सके, किंतु वह संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत मृत्युदंड को आजीवन कारावास या अन्य दंड में परिवर्तित कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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