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वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट को किसने रद्द (निरस्त) किया था?

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1882 में लॉर्ड रिपन ने वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट को निरस्त किया था।
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→ भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 76' के अंतर्गत 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General for India) के पद और उनकी शक्तियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारत का महान्यायवादी देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति को की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्ह (Qualified) हो, और संविधान ने महान्यायवादी के लिए कोई निश्चित पदाअवधि (Fixed Term) तय नहीं की है तथा वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) पद धारण करता है। 2. महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, और उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों तथा संसद की किसी भी समिति (जिसका वह सदस्य बनाया गया हो) की बैठकों में भाग लेने और बोलने का अधिकार है, किंतु उसे संसद के दोनों सदनों में किसी भी मामले पर मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। 3. महान्यायवादी अपने पद पर रहते हुए एक पूर्णकालिक सरकारी कर्मचारी (Full-time government servant) की तरह कार्य करता है, जिसके कारण उसे किसी भी प्रकार के निजी विधिक अभ्यास (Private Legal Practice) से पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है और वह सरकार की अनुमति के बिना किसी भी आपराधिक या सिविल मामले में विपक्षी पक्षकार की तरफ से पैरवी नहीं कर सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारत में नक्शबंदी सिलसिले की शुरुआत किसने की थी? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 323A' और 'अनुच्छेद 323B' के अंतर्गत स्थापित 'प्रशासनिक अधिकरणों' (Administrative Tribunals) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 323A के तहत संसद को केवल संघ के मामलों और उसके अधीन लोक सेवाओं में लगे व्यक्तियों के विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए प्रशासनिक अधिकरण स्थापित करने की शक्ति प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 323B के तहत संसद और राज्य विधानमंडल दोनों को कराधान, विदेशी मुद्रा, आयात-निर्यात और श्रम जैसे अन्य विशिष्ट विषयों के लिए अधिकरण स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई है। 2. 'चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997)' मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि प्रशासनिक अधिकरणों (Tribunals) के निर्णय अंतिम हैं और उनके आदेशों के विरुद्ध उच्च न्यायालयों के 'अनुच्छेद 226' के तहत रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) का मार्ग पूरी तरह से वर्जित है। 3. अधिकरणों (Tribunals) के सदस्यों की नियुक्ति और सेवा शर्तों के संबंध में संसद को यह असीमित शक्ति प्राप्त है कि वह न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत को दरकिनार करते हुए कार्यकारी नियंत्रण को सर्वोच्च बना सकती है और इसके लिए किसी स्वतंत्र चयन समिति की आवश्यकता नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVIII' (आपात उपबंध - अनुच्छेद 352 से 360) के अंतर्गत 'राष्ट्रीय आपातकाल' (National Emergency - अनुच्छेद 352) के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग के संबंध में युद्ध, बाह्य आक्रमण या 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) के आधार पर की जा सकती है, तथा मूल संविधान में 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द के स्थान पर 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द का प्रयोग किया गया था, जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था। 2. मंत्रिमंडल (Cabinet) की लिखित संस्तुति प्राप्त होने के पश्चात ही राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है, और इस प्रकार उद्घोषित आपातकाल को संसद के दोनों सदनों द्वारा उसकी घोषणा की तिथि से एक महीने के भीतर विशेष बहुमत (कुल सदस्यों का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत) द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। 3. राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के प्रभाव के अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त छह मौलिक अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं, किंतु अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का निलंबन किसी भी परिस्थिति में नहीं किया जा सकता है, और अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह आदेश द्वारा भाग III के अन्य मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित कर सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत 'जीवन का अधिकार' और 'निजीता का अधिकार' (Right to Privacy) के ऐतिहासिक न्यायिक निर्णयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. उच्चतम न्यायालय ने 'के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' के ऐतिहासिक नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सर्वसम्मति वाले निर्णय में यह स्पष्ट किया कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न अंग है, और यह एक मौलिक अधिकार है। 2. 'पुट्टस्वामी निर्णय' से पहले, सर्वोच्च न्यायालय ने 'एम.पी. शर्मा बनाम सतीश चंद्र (1954)' तथा 'खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1962)' मामलों में यह निर्णय दिया था कि भारतीय संविधान में निजता के अधिकार का कोई विशिष्ट या अंतर्निहित प्रावधान नहीं है, जिसे बाद के निर्णयों द्वारा उलट दिया गया। 3. निजता का अधिकार एक निरपेक्ष (Absolute) मौलिक अधिकार है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, लोक व्यवस्था या किसी अपराध के निवारण के नाम पर भी संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा इस अधिकार पर कोई विधายकीय प्रतिबंध या युक्तिसंगत निर्बंधन (Reasonable Restrictions) नहीं लगाया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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