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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 के तहत घोषित 'वित्तीय आपातकाल' (Financial Emergency) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. वित्तीय आपातकाल की घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसकी तिथि से दो महीने के भीतर अनुमोदन मिलना अनिवार्य है।
- 2. एक बार अनुमोदित होने के बाद, वित्तीय आपातकाल अनिश्चित काल के लिए तब तक लागू रहता है जब तक कि इसे राष्ट्रपति द्वारा वापस न लिया जाए।
- 3. वित्तीय आपातकाल के दौरान, राष्ट्रपति केंद्र और राज्यों की सेवा करने वाले सभी या किसी भी वर्ग के कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कटौती का निर्देश दे सकते हैं, जिसमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी शामिल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
व्याख्या: वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) के संबंध में तीनों कथन सही हैं। 1. उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा 2 महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना आवश्यक है (पहले यह अवधि 2 महीने थी, 44वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा इसमें संशोधन नहीं किया गया था क्योंकि यह प्रावधान मूल रूप से ऐसा ही है)। 2. राष्ट्रीय आपातकाल के विपरीत, वित्तीय आपातकाल को संसद द्वारा बार-बार अनुमोदित कराने की आवश्यकता नहीं होती; यह तब तक लागू रहता है जब तक राष्ट्रपति इसे रद्द न कर दें। 3. इसके दौरान संघ तथा राज्यों के कर्मचारियों और यहाँ तक कि सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों में कमी की जा सकती है। अब तक भारत में एक भी बार वित्तीय आपातकाल नहीं लगाया गया है।
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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह उपबंध किया गया था कि राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा निरस्त कर दिया गया।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल को संपूर्ण देश या उसके किसी विशिष्ट भाग पर एक साथ लागू करने की व्यवस्था की गई, तथा आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का स्वतः निलंबन केवल 'युद्ध' और 'बाह्य आक्रमण' के आधार पर ही संभव बनाया गया, 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर नहीं।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 359 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह आदेश द्वारा भाग III द्वारा प्रदत्त किसी भी मूल अधिकार के प्रवर्तन को निलंबित कर सकता है, किंतु 44वें संशोधन के पश्चात अनुच्छेद 20 और 21 के प्रवर्तन को निलंबित करने की शक्ति किसी भी परिस्थिति में नहीं दी जा सकती है।
4. वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा उसकी तिथि से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, और एक बार अनुमोदित होने के बाद यह वित्तीय आपातकाल अनिश्चित काल तक तब तक प्रवृत्त रहता है जब तक कि राष्ट्रपति द्वारा इसे वापस (Revoke) नहीं ले लिया जाता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अधिकारिता, शक्तियों और न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 131 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय के आरंभिक (Original) क्षेत्राधिकार के दायरे में भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच का विवाद या दो या अधिक राज्यों के बीच का विवाद आता है, किंतु इसमें किसी संधि, समझौते या प्रसंविदा (Covenant) से उत्पन्न होने वाले विवाद भी शामिल होते हैं, भले ही वह संविधान के प्रारंभ से पूर्व का हो।
2. संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत उच्चतम न्यायालय को अपनी स्वयं की दी गई किसी भी निर्णय या आदेश की पुनराव समीक्षा (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, और संसद इस शक्ति को विधि बनाकर पूर्ण रूप से समाप्त कर सकती है।
3. संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर परामर्श मांगने की शक्ति है जो सार्वजनिक महत्व का हो, और उच्चतम न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि वह ऐसे प्रत्येक मामले में अपनी राय राष्ट्रपति को दे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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ग्राम पंचायतों का संगठन किस अनुच्छेद में है?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) की अधिकारिता, अवमानना और अधीनस्थ न्यायपालिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 215 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होगा और उसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है, जिसमें उच्च न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के मामले में दंड देने की शक्ति भी सम्मिलित है।
2. संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के भीतर सभी न्यायालयों और अधिकरणों (Tribunals) के अधीक्षण (Superintendence) की व्यापक शक्ति प्राप्त है, और यह अधीक्षण शक्ति केवल प्रशासनिक प्रकृति की होती है, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) या न्यायिक नियंत्रण के दायरे तक इसका विस्तार नहीं होता है।
3. अनुच्छेद 233 के अंतर्गत जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है, तथा ऐसे किसी भी व्यक्ति को जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता जो पहले से केंद्र या राज्य की न्यायिक सेवा में सेवारत हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और विशेष उपकरणों (जैसे कि विभिन्न प्रस्तावों और कटौतियों) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अनुसार, धन विधेयक (Money Bill) के अतिरिक्त किसी भी अन्य साधारण विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित किया जा सकता है, तथा यदि कोई साधारण विधेयक संसद के दोनों सदनों के बीच गतिरोध के कारण संयुक्त बैठक (Joint Sitting) में पारित किया जाता है, तो राष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई इस संयुक्त बैठक की अध्यक्षता अनिवार्य रूप से लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि वह अनुपस्थित हो तो लोकसभा का उपाध्यक्ष इसकी अध्यक्षता करता है।
2. बजट प्रक्रिया के दौरान अनुदानों की मांगों पर चर्चा के समय विपक्षी सदस्यों द्वारा 'नीतिगत कटौती प्रस्ताव' (Policy Cut Motion) प्रस्तुत किया जाता है, जिसका उद्देश्य मांग की राशि को घटाकर 1 रुपये करना होता है, और यह प्रस्ताव सरकार की नीतियों के प्रति पूर्ण असहमति को व्यक्त करता है, जबकि 'मितव्ययिता कटौती प्रस्ताव' (Economy Cut Motion) के तहत मांग की राशि में एक निश्चित विशिष्ट राशि की कटौती करने का प्रस्ताव किया जाता है।
3. 'ध्यानाकर्षण प्रस्ताव' (Calling Attention Motion) और 'अल्पकालिक चर्चा' (Short Duration Discussion) दोनों ही भारतीय संसदीय प्रक्रिया के अ-संवैधानिक और परंपरा-आधारित उपकरण हैं, जिनमें ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से किसी सदस्य द्वारा लोक-महत्व के अति-आवश्यक मामले पर मंत्री का ध्यान आकर्षित किया जाता है और इस पर कोई औपचारिक मतदान नहीं होता है, किंतु अल्पकालिक चर्चा के विपरीत ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की पूर्व अनुमति राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष से प्राप्त करना आवश्यक नहीं होता है।
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