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Indian Polity
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भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 323A' के अंतर्गत स्थापित 'प्रशासनिक अधिकरणों' (Administrative Tribunals) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संसद को विधि द्वारा संघ या किसी राज्य के मामलों की लोक सेवा में नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित विवादों के adjudication के लिए प्रशासनिक अधिकरण स्थापित करने की शक्ति प्राप्त है।
- 2. इन अधिकरणों के निर्णय के विरुद्ध अपील सीधे संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय (High Court) में की जा सकती है, और इस क्षेत्राधिकार को संविधान संशोधन द्वारा कभी समाप्त नहीं किया गया है।
- 3. 'चंद्र कुमार मामला (1997)' में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि प्रशासनिक अधिकरणों के निर्णयों के विरुद्ध उच्च न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति संविधान के बुनियादी ढाँचे (Basic Structure) का हिस्सा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के भाग XIV-A के अनुच्छेद 323A के तहत संसद को लोक सेवकों के सेवा मामलों के विवादों के निपटारे के लिए प्रशासनिक अधिकरण स्थापित करने की शक्ति प्राप्त है। कथन 2 गलत है: 'चंद्र कुमार मामले (1997)' से पहले अधिकरणों के फैसले के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट अपील होती थी, लेकिन L. Chandra Kumar v. Union of India (1997) में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि लोग सीधे संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय (High Court) की खंडपीठ (Division Bench) में अपील कर सकते हैं, इसलिए कथन 2 का यह कहना कि उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार कभी समाप्त नहीं किया गया सही है, परंतु मूल व्यवस्था के तहत अपील सीधे सुप्रीम कोर्ट जाती थी जिसे चंद्र कुमार मामले में बदला गया; हालांकि, कथन 2 में 'सीधे संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में की जा सकती है' और 'इस क्षेत्राधिकार को कभी समाप्त नहीं किया गया' वाला हिस्सा भ्रामक है क्योंकि चंद्र कुमार जजमेंट के बाद ही उच्च न्यायालयों के दायरे को अनिवार्य बनाया गया था और अधिकरणों के निर्णयों पर उच्च न्यायालय की शक्ति को संविधान का मूल ढांचा माना गया है। अतः सटीक रूप से कथन 2 आंशिक रूप से त्रुटिपूर्ण हो जाता है क्योंकि मूल अधिनियम (1985) में उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को बाहर कर दिया गया था, जिसे 1997 में बहाल किया गया। कथन 3 सही है: L. Chandra Kumar केस (1997) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालयों की अनुच्छेद 226/227 के तहत न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान की बुनियादी विशेषता (Basic Structure) है और इसे अधिकरणों के माध्यम से भी छीना नहीं जा सकता। अत: केवल कथन 1 और 3 सही हैं।
Related Questions
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' को लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे पुनःस्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक होती है, किंतु राज्यसभा इस विधेयक को पारित करने, अस्वीकृत करने या इसमें संशोधन करने (अनुच्छेद 109 की प्रक्रिया के अधीन रहते हुए) की सामान्य विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकती है।
2. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' (जिसमें ऐसा उपबंध है जिससे Consolidated Fund of India से व्यय करना पड़े) को संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन को उस विधेयक पर विचार करने की संस्तुति न कर दी हो।
3. लोकसभा और राज्यसभा के बीच गतिरोध को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान धन विधेयकों (Money Bills) और संविधान संशोधन विधेयकों के अतिरिक्त साधारण विधियों और वित्तीय विधेयकों—दोनों श्रेणियों—के मामलों में लागू होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के भाग IV-A के अनुच्छेद 51A में जोड़ा गया था, तथा वर्तमान में इसमें कुल 11 मूल कर्तव्य हैं, जिनमें से 11वाँ मूल कर्तव्य 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया था।
2. संविधान के अनुच्छेद 51A के तहत उल्लिखित मूल कर्तव्यों में यह स्पष्ट रूप से प्रावधानित है कि प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का परितक्षण करे और उसका संवर्धन करे।
3. प्रकृति से ये मूल कर्तव्य अप्रवर्तनीय (Non-justiciable) हैं, अर्थात् इनके सीधे उल्लंघन पर स्वतः कोई कानूनी दंड का प्रावधान संविधान में नहीं है, किंतु संसद को यह अधिकार प्राप्त है कि वह विधिवत कानून बनाकर इनके प्रवर्तन और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत का प्रथम नागरिक?
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मौलिक अधिकार का रक्षक?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित 'राजनीतिक न्याय' के आदर्श को सोवियत संघ (रूस) की क्रांति (1917) से ग्रहण किया गया है, जबकि प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के आदर्शों को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिया गया है।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'इन री बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में यह निर्णय दिया गया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग (Integral Part) है और संसद इसमें अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन कर सकती है।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का भाग है तथा इसमें संसद द्वारा संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) का उल्लंघन किए बिना संशोधन किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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