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खुले अंत वाले प्रश्न छात्रों को एक ही समस्या के कई नवीन समाधान सोचने के लिए प्रेरित करते हैं, जो अपसारी चिंतन को बढ़ावा देता है।
थॉर्नडाइक के प्रयास एवं त्रुटि (Trial and Error) सिद्धांत को उद्दीपन-अनुक्रिया (S-R) सिद्धांत के नाम से भी जाना जाता है।
मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष) में बालक वस्तुओं को उनके आकार, वजन या लंबाई के आधार पर क्रमबद्ध करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
भारत में प्रतिवर्ष 29 अगस्त को हॉकी के जादूगर 'मेजर ध्यानचंद' के जन्मदिन के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।
निदानात्मक मूल्यांकन का उद्देश्य यह पता लगाना है कि छात्र कहाँ और क्यों कठिनाई का सामना कर रहे हैं, ताकि उपचारात्मक शिक्षण दिया जा सके।
वस्तु स्थायित्व का अर्थ है यह समझना कि वस्तुएं तब भी मौजूद रहती हैं जब वे दिखाई न दें। यह गुण संवेदी-पेशीय अवस्था (0-2 वर्ष) में विकसित होता है।
आंतरिक प्रेरणा सबसे प्रभावी है क्योंकि यह छात्र में सीखने की स्वाभाविक जिज्ञासा और रुचि पैदा करती है।
वाइगोत्सकी का मानना है कि भाषा और विचार अलग-अलग शुरू होते हैं, लेकिन भाषा चिंतन को दिशा देने वाला मुख्य उपकरण है।
पूर्व-परंपरागत स्तर पर बच्चे की नैतिकता का निर्धारण बाहरी परिणामों जैसे कि दंड से बचने या स्वयं को लाभ पहुँचाने से होता है।
बुद्धि के संरचना मॉडल (SI Model) का प्रतिपादन जे.पी. गिलफोर्ड ने किया था, जिसमें उन्होंने बुद्धि के तीन आयाम बताए थे।
औपचारिक-संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष से ऊपर) में बालक वास्तविक दुनिया से परे अमूर्त अवधारणाओं और परिकल्पनाओं पर चिंतन करने में सक्षम हो जाता है।
1857 की क्रांति में बिहार के जगदीशपुर (आरा) के जमींदार बाबू वीर कुंवर सिंह ने नेतृत्व किया था। वे 80 वर्ष की आयु में भी अंग्रेजों के विरुद्ध वीरता से लड़े। उन्हें 'बिहार का शेर' और 'जगदीशपुर का बाबू' कहा जाता है। उन्होंन...
भारत ने हाल ही में 'जापान' (JAXA) के साथ अपने सौर मिशनों और अंतरिक्ष अन्वेषण में सहयोग करने की घोषणा की है। यह सहयोग अंतरिक्ष तकनीक में भारत की वैश्विक धाक को और मजबूत करेगा।
अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी के विरुद्ध अधिकार देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 'जम्मू और कश्मीर' राज्य को एक विशेष दर्जा प्रदान करता था। 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने इसे निरस्त कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में विभाजित कर दिया।
संवेदी-पेशीय अवस्था (0-2 वर्ष) में शिशु यह समझने लगता है कि वस्तुएं तब भी मौजूद रहती हैं जब वे आंखों से ओझल हो जाती हैं।
सी.एल. हल (C.L. Hull) के सिद्धांत को 'पुनर्बलन का सिद्धांत' कहा जाता है, जो मानता है कि अधिगम आवश्यकता की पूर्ति (Need Reduction) पर आधारित होता है।
मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष) में बालक वस्तुओं को उनके आकार या गुण के आधार पर क्रमबद्ध (Seriation) करने में सक्षम हो जाता है।