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Indian Polity
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अनुच्छेद 51A में कितने मूल कर्तव्य हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
मूल कर्तव्य 11 हैं।
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राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों (विधानसभा और विधान परिषद) की शक्तियों, विधाई प्रक्रियाओं तथा उनके गठन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अंतर्गत संसद किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए विधि बना सकती है, बशर्ते संबंधित राज्य की विधानसभा ने कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का एक संकल्प पारित किया हो।
2. धन विधेयक (Money Bill) को केवल राज्य की विधानसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, विधान परिषद में नहीं; और यदि विधान परिषद किसी धन विधेयक को अपने पास बिना किसी संशोधन के अधिकतम 14 दिनों तक रोक सकती है या उस पर अपनी संस्तुतियाँ दे सकती है, जिन्हें विधानसभा द्वारा मानना या न मानना पूरी तरह अनिवार्य होता है।
3. साधारण विधेयक के मामले में राज्य विधानमंडल की द्विसदनीय व्यवस्था में विधानसभा की स्थिति अत्यंत प्रभावी होती है, क्योंकि विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को प्रथम बार में अधिकतम चार महीने (प्रथम बार 3 महीने और विधान परिषद द्वारा लौटाए जाने पर पुनः 1 महीने) तक ही रोक सकती है, जिसके पश्चात विधानसभा द्वारा पुनः पारित कर दिए जाने पर विधेयक दोनों सदनों से पारित मान लिया जाता है, भले ही विधान परिषद उसे अस्वीकार ही क्यों न कर दे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधायी प्रक्रिया और सदनों की शक्तियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अंतर्गत धन विधेयकों को छोड़कर किसी साधारण विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित किया जा सकता है, और यदि कोई साधारण विधेयक दोनों सदनों के बीच गतिरोध के कारण संयुक्त बैठक (Joint Sitting) में पारित किया जाता है, तो इसके लिए राज्यसभा की अंतिम सहमति अनिवार्य होती है, भले ही लोकसभा में उसका बहुमत न हो।
2. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) राज्यसभा में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, और लोकसभा द्वारा पारित धन विधेयक जब राज्यसभा को भेजा जाता है, तो राज्यसभा को उसे अपनी सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिशों के चौदह दिन के भीतर लोकसभा को वापस लौटाना अनिवार्य होता है, और यदि राज्यसभा निर्धारित अवधि में विधेयक वापस नहीं करती है, तो वह दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह लोकसभा द्वारा पारित किया गया था।
3. संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत बुलाई जाने वाली संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है, तो राज्यसभा का उपसभापति उसकी अध्यक्षता करता है, किंतु किसी भी परिस्थिति में राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत 'समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता' का प्रावधान मूल संविधान में 1950 में ही अंतःस्थापित किया गया था, जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा और अधिक सशक्त बनाया गया।
2. संविधान का अनुच्छेद 40 पंचायतों के संगठन से संबंधित एक गांधीवादी सिद्धांत है, जिसे बाद में 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियमों के माध्यम से संवैधानिक और त्रिस्तरीय रूप प्रदान किया गया।
3. अनुच्छेद 48A के अंतर्गत पर्यावरण का संरक्षण और संवहन तथा वन एवं वन्यजीवों की रक्षा का प्रावधान मूल संविधान में नहीं था, बल्कि इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में जोड़ा गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और सदनों की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं; और यदि राज्यसभा किसी धन विधेयक को बिना किसी संशोधन के लौटा देती है या चौदह दिन की समयावधि बीत जाती है, तो वह विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है, भले ही राज्यसभा ने उस पर औपचारिक मतदान न किया हो।
2. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) केवल साधारण विधेयकों और वित्तीय विधेयकों (श्रेणी-I) के मामलों में ही आहत कर सकता है, जबकि संविधान संशोधन विधेयकों तथा धन विधेयकों के संदर्भ में संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
3. लोकसभा द्वारा पारित और राज्यसभा को प्रेषित किसी साधारण विधेयक के संबंध में यदि दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न होता है और राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुलाने की मंशा की सूचना दे देता है, तो राज्यसभा द्वारा विधेयक को छह महीने तक रोक लेने की स्थिति में ही संयुक्त बैठक आहूत की जा सकती है, भले ही इस अवधि के दौरान लोकसभा विघटित हो गई हो।
4. संसद में विधाई प्रक्रिया के दौरान यदि कोई विधेयक लोकसभा में लंबित है और लोकसभा के विघटन के कारण वह व्यपगत (Lapse) हो जाता है, किंतु राष्ट्रपति ने उसके संबंध में संयुक्त बैठक बुलाने की अपनी मंशा अधिसूचित कर दी है, तो ऐसा विधेयक व्यपगत नहीं होगा और वह संयुक्त बैठक में विचार के लिए जीवित बना रहेगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power - अनुच्छेद 72) और उसकी न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (जिसमें क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार और लघुकरण शामिल हैं) एक कार्यपालिका शक्ति है, और राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग करते समय मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए पूर्ण रूप से बाध्य होता है, भले ही दया याचिका पर निर्णय लेने में अत्यधिक विलंब क्यों न हुआ हो।
2. उच्चतम न्यायालय द्वारा 'ईपुरा सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' (2006) और अन्य मामलों में यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है, और यह समीक्षा इस आधार पर हो सकती है कि निर्णय आदेश या विवेक का प्रयोग तर्कहीन, मालाफाइड (सद्भावना रहित), या अप्रासंगिक विचारों पर आधारित था।
3. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध भी क्षमादान देने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्यपाल की अनुच्छेद 161 के तहत प्रदत्त क्षमादान शक्ति से इस मामले में विस्तृत है कि राज्यपाल सैन्य न्यायालय के दंड या मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान नहीं दे सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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