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UPTET
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प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और दर्शन के संदर्भ में, 'चार्वाक दर्शन' (लोकायत दर्शन) और उसके भौतिकवादी सिद्धांतों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. चार्वाक दर्शन भारत का एकमात्र प्रमुख प्राचीन नास्तिक (Heterodox) दर्शन है जो वेदों की प्रमाणिकता को पूरी तरह अस्वीकार करता है और इसे केवल 'धूर्तों की रचना' मानता है। 2. इस दर्शन के अनुसार इस जगत की उत्पत्ति पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि) और वायु- इन चार महाभूतों से हुई है, और चेतना या आत्मा इन तत्वों के विशिष्ट संयोग से उत्पन्न होने वाला एक आकस्मिक गुण है, जो शरीर के नाश के साथ ही समाप्त हो जाता है। 3. चार्वाक दर्शन मोक्ष या पुनर्जन्म के सिद्धांत को नहीं मानता और 'यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' (जब तक जियो, सुख से जियो, ऋण लेकर भी घी पियो) के माध्यम से जीवन के एकमात्र उद्देश्य 'सुखवाद' (Hedonism) या भौतिक सुख को स्थापित करता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

चार्वाक दर्शन (जिसे लोकायत दर्शन भी कहा जाता है) प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नास्तिक (वेद-विरोधी) और पूर्णतः भौतिकवादी दर्शन है। उपर्युक्त तीनों कथन पूरी तरह सही हैं: 1. चार्वाक दर्शन वेदों, यज्ञों और पुरोहितवाद को पूरी तरह खारिज करता है तथा इसे ढोंग मानता है। 2. यह केवल चार भूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु) को ही जगत का मूल कारण मानता है (आकाश को यह भूत नहीं मानता क्योंकि उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं होती)। इसके अनुसार शरीर से भिन्न कोई अमर आत्मा नहीं होती। 3. यह पुनर्जन्म, परलोक और मोक्ष को नकारते हुए वर्तमान जीवन के सुख को ही पुरुषार्थ मानता है। UPTET परीक्षा के दृष्टिकोण से भारतीय दर्शन (आस्तिक और नास्तिक दर्शन) के मूल सिद्धांतों की यह जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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