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भारतीय पर्यावरण कानून और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना वर्ष 2010 में 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम' के तहत की गई थी, और यह सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत निर्धारित सख्त न्यायिक प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करने के लिए बाध्य है।
  2. 2. यह अधिकरण पर्यावरण से संबंधित किसी भी मामले में आदेश, निर्णय या पुरस्कार के खिलाफ अपनी ही पीठ के समक्ष पुनर्विचार (Review) याचिका दायर करने की शक्ति रखता है, लेकिन इसके निर्णयों के विरुद्ध पहली अपील सीधे उच्चतम न्यायालय में ही की जा सकती है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के तहत दी गई न्यायिक प्रक्रियाओं से बंधा हुआ नहीं है। यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) के आधार पर कार्य करता है। कथन 2 गलत है: NGT अधिनियम, 2010 की धारा 19(4)(j) के अनुसार अधिकरण को अपने किसी भी निर्णय या आदेश की समीक्षा (Review) करने की शक्ति प्राप्त है। हालाँकि, NGT के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील सीधे **उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)** में 90 दिनों के भीतर की जा सकती है, न कि उच्च न्यायालयों (High Courts) में। (नोट: NGT अधिनियम के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान है)। अतः दोनों कथन गलत हैं।
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