BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Civil services
19 views

भारतीय अर्थव्यवस्था में 'भुगतान संतुलन' (Balance of Payments - BoP) और इसके घटकों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. भुगतान संतुलन के 'चालू खाता' (Current Account) के अंतर्गत दृश्य वस्तुओं (Merchandise Goods) के व्यापार के साथ-साथ अदृश्य वस्तुओं (Services), प्रेषण (Remittances) और निवेश आय को शामिल किया जाता है, तथा चालू खाता घाटा (CAD) तब उत्पन्न होता है जब देश की कुल विदेशी मुद्रा प्राप्तियां (Receipts) उसके कुल विदेशी भुगतानों (Payments) से अधिक हो जाती हैं।
  2. 2. 'पूंजी खाता' (Capital Account) देश के उन सभी अंतरराष्ट्रीय लेन-देन को दर्ज करता है जो देश की परिसंपत्तियों या देनदारियों (Assets and Liabilities) को प्रभावित करते हैं, जिसके अंतर्गत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI), विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) और बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB) को शामिल किया जाता है।
  3. 3. आधिकारिक आरक्षित खाता (Official Reserve Account) भुगतान संतुलन का एक अनिवार्य हिस्सा है, और यदि चालू खाते और पूंजी खाते का कुल योग शून्य नहीं होता है, तो इस असंतुलन को पूरा करने या समायोजित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा विदेशी मुद्रा भंडारों (Foreign Exchange Reserves) में परिवर्तन के माध्यम से इसका समायोजन किया जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि 'चालू खाता घाटा' (CAD) तब उत्पन्न होता है जब देश की कुल विदेशी मुद्रा प्राप्तियां उसके कुल विदेशी भुगतानों से कम होती हैं, न कि अधिक। यदि प्राप्तियां भुगतानों से अधिक होती हैं, तो उसे चालू खाता अधिशेष (Current Account Surplus) कहा जाता है। कथन 2 सही है। पूंजी खाता देश की विदेशी परिसंपत्तियों और देनदारियों में होने वाले परिवर्तनों को दर्ज करता है, जिसमें FDI, FPI और ऋण (जैसे ECB) शामिल होते हैं। कथन 3 सही है। भुगतान संतुलन लेखांकन रूप से हमेशा संतुलित (Balanced) होता है। चालू और पूंजी खातों के योग में होने वाले अंतर (असंतुलन) को केंद्रीय बैंक द्वारा 'आधिकारिक आरक्षित खाते' (Official Reserve Account) के माध्यम से समायोजित किया जाता है।
Share:

Related Questions

→ भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत केंद्र और राज्यों के बीच 'विधायी संबंधों' (अनुच्छेद 245 से 255) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार संसद को पूरे या भारत के किसी भी भाग के लिए कानून बनाने की प्रादेशिक शक्ति (Territorial jurisdiction) प्राप्त है, तथा संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को इस आधार पर अवैध घोषित नहीं किया जा सकता कि उनका अतिरिक्त-प्रादेशिक (Extra-territorial) प्रवर्तन होता है। 2. संविधान की सातवीं अनुसूची की 'समवर्ती सूची' (Concurrent List) के विषयों पर विधि बनाने की शक्ति संसद और राज्य विधानमंडलों दोनों को प्राप्त है, किंतु यदि किसी समवर्ती सूची के विषय पर राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून संसद द्वारा बनाए गए पूर्ववर्ती कानून के प्रतिकूल या असंगत है, तो संसद का कानून मान्य होगा और राज्य का कानून उस सीमा तक शून्य हो जाएगा, भले ही राज्य के कानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली हो। 3. संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से एक संकल्प पारित कर यह घोषित करे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या expedient है कि संसद राज्य सूची में प्रगणित किसी विषय पर कानून बनाए, तो संसद को उस विषय पर पूरे देश या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति मिल जाती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है, जिसे बार-बार अनिश्चितकाल तक बढ़ाया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारत के अंतिम ब्रिटिश वायसराय कौन थे? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन (President's Rule) के प्रावधानों तथा इससे संबंधित ऐतिहासिक न्यायिक निर्णयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति को किसी राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन इस संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है, तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा राज्य सरकार के कृत्यों को अपने हाथ में ले सकता है। 2. 'एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायोचित (Justiciable) है, और यदि उद्घोषणा का आधार अप्रासंगिक, दुर्भावनापूर्ण या असंवैधानिक पाया जाता है, तो न्यायालय उस उद्घोषणा को रद्द कर सकता है और विघटित राज्य विधानसभा को बहाल भी कर सकता है। 3. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह प्रावधान किया गया कि अनुच्छेद 356 के तहत जारी की गई राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा उसकी प्रारंभिक तिथि से 'दो महीने' के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, अन्यथा यह अवधि समाप्त होने पर स्वतः निष्प्रभावी हो जाएगी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → गांधी-इरविन समझौते को किस अन्य नाम से जाना जाता है? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'संघ की न्यायपालिका' (The Union Judiciary - अनुच्छेद 124 से 147) तथा उच्चतम न्यायालय की शक्तियों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 137 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन या अनुच्छेद 143 के अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन, अपने द्वारा सुनाई गई किसी भी निर्णय या आदेश का पुनरावलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है। 2. उच्चतम न्यायालय की 'सलाहकारिता अधिकारक्षेत्र' (Advisory Jurisdiction) के अंतर्गत, यदि राष्ट्रपति किसी सार्वजनिक महत्व के विधि या तथ्य के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय मांगते हैं, तो न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को अपनी राय देना अनिवार्य है और न्यायालय द्वारा दी गई वह सलाह राष्ट्रपति पर पूर्णतः बाध्यकारी होती है। 3. संविधान के अनुच्छेद 142 के अनुसार उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसा कोई डिक्री या आदेश पारित कर सकता है जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक हो, और ऐसा प्रत्येक आदेश पूरे भारत में प्रवर्तनीय होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.