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भारतीय इतिहास के अंतर्गत 'वैदिक काल' और 'महाजनपद काल' की सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक संरचना के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ऋग्वैदिक काल में समाज मूल रूप से कबीलाई और समतावादी था, जिसमें गोत्र व्यवस्था और सभा-समिति जैसी राजनीतिक संस्थाएँ राजा की निरंकुशता पर नियंत्रण रखती थीं, किंतु उत्तर वैदिक काल तक आते-आते लोहे के व्यापक प्रयोग, कृषि के विस्तार और वर्ण व्यवस्था के कठोर होने के कारण इन लोकप्रिय सभाओं का महत्व समाप्त हो गया और क्षेत्रीय राज्यों (जनपदों) का उदय हुआ।
- 2. उत्तर वैदिक काल के अंत और महाजनपद काल के आरंभ में 'श्रेणी' (Shreni) नामक व्यापारिक और शिल्पकारों के संगठनों का प्रादुर्भाव हुआ, जो न केवल उत्पादन और व्यापार का नियमन करते थे बल्कि अपनी स्वयं की सेना रखने, न्याय करने और अपने सदस्यों के लिए बैंक के रूप में धन जमा करने व ऋण देने का कार्य भी करते थे।
- 3. छठी शताब्दी ईसा पूर्व के महाजनपद काल में प्रचलित 'गण-संघ' (Gana-Sangha या Oligarchy) व्यवस्था राजतंत्रात्मक प्रणालियों से पूर्णतः भिन्न थी, जहाँ प्रशासन का संचालन राजा द्वारा वंशानुगत रूप से न होकर एक शासक समूह या 'संघात' द्वारा किया जाता था, और इस व्यवस्था में बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म के उदय के लिए अत्यधिक प्रतिकूल सामाजिक परिस्थितियाँ उत्पन्न की गईं क्योंकि ये धर्म रूढ़िवादी वैदिक अनुष्ठानों का समर्थन करते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: ऋग्वैदिक काल में समाज कबीलाई (Tribal) और काफी हद तक समतावादी था। सभा और समिति जैसी संस्थाएँ राजा की शक्तियों पर अंकुश लगाती थीं। उत्तर वैदिक काल में लोहे की खोज (लगभग 1000 ईसा पूर्व), कृषि के विस्तार, अधिशेष उत्पादन और वर्ण व्यवस्था के जटिल होने से कबीलाई समाज क्षेत्रीय जनपदों में बदल गया, जिससे सभा और समितियों का प्रभाव क्षीण हो गया।
कथन 2 सही है: महाजनपद काल में शिल्पकारों और व्यापारियों के संगठन को 'श्रेणी' (Shreni) या 'पूग' कहा जाता था। ये श्रेणियाँ अपने सदस्यों के लिए उत्पादन के मानक तय करती थीं, कीमतें निर्धारित करती थीं और साथ ही एक वित्तीय संस्थान (बैंक) के रूप में कार्य करते हुए लोगों की जमा राशि स्वीकार करती थीं। कई शक्तिशाली श्रेणियों के पास अपनी सुरक्षा के लिए निजी सशस्त्र बल भी होते थे।
कथन 3 गलत है: छठी शताब्दी ईसा पूर्व के महाजनपद काल में दो प्रकार की शासन प्रणालियाँ थीं—राजतंत्र और गण-संघ (Oligarchy/Republics जैसे वज्जि और मल्ल)। गण-संघों में शासन किसी एक राजा द्वारा नहीं, बल्कि कुलीन परिवारों के प्रतिनिधियों की एक सभा द्वारा चलाया जाता था। इसके अलावा, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उदय के लिए ये गण-संघ और उस समय की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ अत्यधिक *अनुकूल* (Favorable) थीं, न कि प्रतिकूल, क्योंकि इन धर्मों ने जाति व्यवस्था और वैदिक कर्मकांडों की खुलकर आलोचना की थी।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329) और उससे संबंधित प्रावधानों के अंतर्गत निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार, संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए होने वाले सभी निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग में निहित होती है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर नियुक्त अन्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।
2. मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की संस्तुति के बिना किसी भी परिस्थिति में उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 329 के प्रावधानों के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन या सीटों के आवंटन से संबंधित कानूनों का निर्माण कर सकती है, तथा इस अनुच्छेद के अंतर्गत किसी भी चुनाव को किसी भी न्यायालय में केवल 'चुनाव याचिका' (Election Petition) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है, जिसे किसी उच्च न्यायालय द्वारा अधिकृत प्राधिकारी के समक्ष ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' (संघ और राज्यों के बीच विधायी संबंध - अनुच्छेद 245 से 255) के अंतर्गत संसद की कानून बनाने की शक्ति और उसकी प्रादेशिक सीमा से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार, संसद को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है, तथा संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को इस आधार पर अवैध घोषित नहीं किया जा सकता है कि उसका प्रभाव भारत के बाहर 'अतिरिक्त-प्रादेशिक' (Extra-territorial operation) है।
2. संविधान के अनुच्छेद 249 के अंतर्गत, यदि राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या expedient है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी भी विषय पर कानून बनाए, तो संसद उस विषय पर पूरे देश या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है।
3. जब दो या अधिक राज्य के विधानमंडल इस आशय के प्रस्ताव पारित करके संसद से अनुरोध करते हैं कि राज्य सूची के किसी विषय पर संसद द्वारा कानून बनाया जाए, तो संसद केवल उन्हीं राज्यों के लिए कानून बना सकती है जिन्होंने ऐसा अनुरोध किया है, किंतु बाद में अन्य कोई भी राज्य विधानमंडल उस अधिनियम को अपने यहां अंगीकृत (Adopt) कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' और इसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की 'रिट अधिकारिता' (Writ Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकारपृच्छा (Quo-Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) जैसी पांच प्रकार की रिट जारी कर सकता है, और यह अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के मूल (Original) किंतु अनन्य (Exclusive) क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय केवल तभी रिट जारी कर सकता है जब किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो, और वह किसी सामान्य कानूनी अधिकार (Legal Right) के उल्लंघन के मामले में अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी नहीं कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत मौलिक अधिकारों के साथ-साथ सामान्य कानूनी अधिकारों के उल्लंघन पर भी रिट जारी कर सकते हैं।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान, अनुच्छेद 352 के प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह आदेश द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में जाने के अधिकार को निलंबित कर सकता है, सिवाय इसके कि अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन के लिए कोई कार्यवाही निलंबित नहीं की जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा किस कार्यक्रम की शुरुआत की गई है, जिसमें 23 देशों के प्रतिनिधि भारत की चुनाव प्रक्रिया का अध्ययन करेंगे?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'संघ की न्यायपालिका' (The Union Judiciary - सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 124 से 147) तथा 'न्यायिक पुनरावलोकन' (Judicial Review) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 137 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि या उसके द्वारा दिए गए किसी आदेश या निर्णय का पुनरावलोकन करने की शक्ति प्राप्त है, बशर्ते इस शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब संसद इस आशय का कोई विशेष अधिनियम पारित करे।
2. 'न्यायिक पुनरावलोकन' की संकल्पना का प्रत्यक्ष उल्लेख मूल संविधान के अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 32 में स्पष्ट रूप से किया गया है, जिसके तहत उच्चतम न्यायालय को संघ या राज्यों के ऐसे किसी भी कानून को शून्य घोषित करने की शक्ति प्राप्त है जो संविधान के भाग III (मौलिक अधिकारों) का उल्लंघन करते हैं।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि 'संविधान की सर्वोच्चता' और 'न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति' दोनों ही भारतीय संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) का अभिन्न अंग हैं, जिन्हें संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के तहत किए जाने वाले संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से भी समाप्त या छीना नहीं जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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