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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' तथा इसके न्यायिक विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में (लोकसभा या राज्यसभा) पुनः स्थापित किया जा सकता है, किंतु इसे पारित करने के लिए संसद के प्रत्येक सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत होना अनिवार्य है, साथ ही इस प्रक्रिया के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति या सिफारिश लेना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।
  2. 2. 'शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951)' और 'सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965)' मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रारंभिक निर्णय दिया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, और 'विधि का नियम' या अनुच्छेद 13 के अंतर्गत आने वाली 'विधि' शब्द में संविधान संशोधन अधिनियम शामिल नहीं हैं।
  3. 3. 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णयों को बदलते हुए यह स्पष्ट किया कि संसद की अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन करने की शक्ति व्यापक अवश्य है, किंतु यह असीमित नहीं है और संसद संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) को नष्ट या क्षीण करने वाला कोई संशोधन नहीं कर सकती है, तथा यह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे प्रत्येक सदन द्वारा कुल सदस्यों के बहुमत (50% से अधिक) तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित करना आवश्यक होता है। हालांकि, संविधान संशोधन विधेयक को संसद में पेश करने के लिए 'राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति या सिफारिश' की कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं होती है (राष्ट्रपति इस पर बाद में हस्ताक्षर करते हैं)। कथन 2 सही है: 'शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951)' और 'सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965)' के शुरुआती मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति है और अनुच्छेद 13 की 'विधि' में संविधान संशोधन अधिनियम शामिल नहीं हैं। कथन 3 सही है: 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' मामले में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने अपने पुराने फैसलों को पलटते हुए 'मूल ढांचे के सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) को प्रतिपादित किया और यह व्यवस्था दी कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन वह इसके मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती।
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