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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 200' और 'अनुच्छेद 201' के अंतर्गत राज्य की विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल की शक्तियों तथा राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक सुरक्षित रखने के संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 200 के अनुसार, जब राज्य के विधानमंडल द्वारा कोई विधेयक पारित कर दिया जाता है और उसे राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल के पास यह विकल्प होता है कि वह अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, या विधेयक को (धन विधेयक को छोड़कर) राज्य विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
- 2. 'राज्य सरकार बनाम तमिलनाडु राज्य (2023)' और अन्य हालिया न्यायिक निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि यदि राज्यपाल किसी विधेयक पर अपनी अनुमति रोक लेता है (Pocket Veto या Absolute Veto का प्रयोग करता है), तो उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह उस विधेयक को यथाशीघ्र मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखे, क्योंकि राज्यपाल का यह निर्णय पूरी तरह से उसका अंतिम स्वविवेक है जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
- 3. अनुच्छेद 201 के तहत यदि कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा जाता है, तो राष्ट्रपति के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वह छह महीने के भीतर अपनी अनुमति दे या रोक ले, और यदि राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति रोक लेते हैं, तो राज्य विधानमंडल उस विधेयक को दोबारा साधारण बहुमत से पारित करके राष्ट्रपति की अनुमति को दरकिनार कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, जब राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कोई विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है, या धन विधेयक को छोड़कर किसी अन्य विधेयक को पुनर्विचार के लिए सदन को वापस लौटा सकता है। यदि विधानमंडल संशोधन सहित या रहित विधेयक को पुनः पारित कर देता है, तो राज्यपाल उस पर अनुमति रोकने के लिए बाध्य नहीं हो सकता (संविधान संशोधन के अनुसार)।
कथन 2 गलत है: हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने (विशेषकर तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में) यह स्पष्ट किया है कि राज्यपाल यदि किसी विधेयक पर अनुमति रोकता है, तो उसे 'यथाशीघ्र' (as soon as possible) विधेयक को सदन को वापस भेजना होगा। राज्यपाल अनिश्चितकाल तक विधेयकों को अपने पास रोककर नहीं रख सकता, और यदि वह विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजना चाहता है या अनुमति रोकता है, तो यह निर्णय मनमाना नहीं हो सकता और इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है।
कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखे गए विधेयक पर राष्ट्रपति के लिए संविधान में कोई समय-सीमा (Time Limit) तय नहीं की गई है कि उन्हें कितने दिनों में निर्णय लेना है। इसके अलावा, यदि राष्ट्रपति किसी राज्य के विधेयक पर अपनी अनुमति रोक लेते हैं (Absolute Veto), तो राज्य विधानमंडल उसे दोबारा पारित करके राष्ट्रपति की अनुमति को ओवरराइड नहीं कर सकता है। अतः कथन 3 पूरी तरह गलत है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVII' (राजभाषा - अनुच्छेद 343 से 351) के अंतर्गत संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा और 'राजभाषा अधिनियम, 1963' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 120 के अनुसार, संसद में कार्य-निष्पादन की भाषा हिंदी या अंग्रेजी होगी, किंतु लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति ऐसे किसी सदस्य को सदन में अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकते हैं जो हिंदी या अंग्रेजी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 343 में यह उपबंध किया गया था कि संविधान के प्रारंभ से 15 वर्ष की अवधि (अर्थात 26 जनवरी 1965 तक) के बाद संघ के सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग स्वतः समाप्त हो जाएगा, बशर्ते संसद विधि द्वारा इसके आगे भी अंग्रेजी के प्रयोग को अधिकृत न करे।
3. राजभाषा अधिनियम, 1963 के प्रावधानों के तहत यह सुनिश्चित किया गया कि 26 जनवरी 1965 के बाद भी संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए और संसद में कार्य-व्यवहार के लिए हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का निरंतर प्रयोग अनिश्चितकाल तक किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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समानता का अधिकार भारतीय संविधान के किन अनुच्छेदों के बीच वर्णित है?
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स्वदेशी आंदोलन के दौरान कौन सा गीत भारत का राष्ट्रीय गीत बन गया?
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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियाँ' (Pardoning Powers - Article 72) तथा राज्यपाल की शक्तियों (Article 161) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, जहाँ दंड या दंडादेश किसी ऐसे विषय से संबंधित है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, या सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिया गया है, या मृत्युदंड (Death Sentence) का मामला है।
2. राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) और राष्ट्रपति की शक्ति (अनुच्छेद 72) के बीच एक मुख्य अंतर यह है कि राज्यपाल को सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के संबंध में कोई क्षमादान शक्ति प्राप्त नहीं है, और साथ ही राज्यपाल मृत्युदंड को पूरी तरह से क्षमा (Pardon) या निरस्त नहीं कर सकता है, यद्यपि वह अन्य मामलों में दंडादेश का लघुकरण या परिहार कर सकता है।
3. 'एकीकरण और न्यायिक समीक्षा' के सिद्धांतों के तहत, राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा क्षमादान याचिकाओं पर लिए गए निर्णयों को देश के किसी भी न्यायालय में किसी भी परिस्थिति में चुनौती नहीं दी जा सकती है, क्योंकि यह पूरी तरह से कार्यपालिका की एक अनन्य (Exclusive) और पूर्ण विवेकाधीन शक्ति है जिस पर न्यायिक पुनरावलोकन लागू नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' और 'भाग IX-A' (क्रमशः पंचायतें और नगरपालिकाएं) के प्रावधानों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा देश में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था और नगरपालिकाओं की स्थापना को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया, जिसके तहत इन निकायों के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करने की शक्ति प्रत्येक राज्य के राज्यपाल में निहित की गई है।
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उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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