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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 124' के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति' और इसके लिए 'कॉलेजियम प्रणाली' के विकास से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के मूल पाठ में यह प्रावधान था कि उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात की जाएगी, जिनसे परामर्श करना राष्ट्रपति के लिए संवैधानिक रूप से अनिवार्य था।
- 2. 'द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993)' में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह निर्णय दिया था कि 'परामर्श' (Consultation) शब्द का अर्थ 'सहमति' (Concurrence) है, और इसके तहत मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगी।
- 3. 'नब्बेवां संविधान संशोधन अधिनियम, 2011' के माध्यम से 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' (NJAC) की स्थापना की गई थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 'चौथे न्यायाधीश मामला (2015)' में संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: संविधान के मूल पाठ (अनुच्छेद 124(2)) के अनुसार राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करते थे जिनसे परामर्श करना राष्ट्रपति आवश्यक समझते थे, किंतु यह परामर्श राष्ट्रपति के लिए कतई बाध्यकारी नहीं था। 'परामर्श' को 'सहमति' का रूप बाद में न्यायिक निर्णयों के माध्यम से दिया गया।
कथन 2 सही है: 'द्वितीय न्यायाधीश मामला (Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India, 1993)' में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी कि अनुच्छेद 124(2) में प्रयुक्त 'परामर्श' शब्द का वास्तविक न्यायिक अर्थ 'सहमति' (Concurrence) है। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि उनके द्वारा वरिष्ठतम न्यायाधीशों के कॉलेजियम के साथ परामर्श के बाद दी गई संस्तुति राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगी।
कथन 3 गलत है: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) की स्थापना 'नब्बेवां' नहीं, बल्कि **'संतानवां संविधान संशोधन अधिनियम, 2014'** के माध्यम से की गई थी। हालांकि, यह तथ्य सही है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 'चौथे न्यायाधीश मामला (2015)' में इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) के विरुद्ध बताते हुए खारिज कर दिया था। चूँकि संशोधन का वर्ष और संख्या गलत दी गई है, इसलिए कथन 3 गलत है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत मूल अधिकारों के तहत 'समानता के अधिकार' (Articles 14-18) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत प्रदत्त 'विधि के समक्ष समता' (Equality before Law) का विचार ब्रिटिश मूल का एक नकारात्मक अवधारणा है जिसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति के पक्ष में कोई विशेष विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए, जबकि 'विधियों का समान संरक्षण' (Equal Protection of the Laws) अमेरिकी संविधान से ली गई एक सकारात्मक अवधारणा है जो समान परिस्थितियों में समान व्यवहार की अपेक्षा करती है।
2. अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी, तथा इस अधिकार के तहत संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा किसी राज्य में रोजगार या नियुक्ति के लिए उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के निवास की शर्त को अनिवार्य बना सकती है।
3. अनुच्छेद 18 के अंतर्गत राज्य द्वारा सेना या विद्या संबंधी सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि प्रदान नहीं की जाएगी, तथा भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से राष्ट्रपति की पूर्व सहमति के बिना कोई भी उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता है, और विदेशी नागरिकों के लिए भी यह प्रावधान है कि वे भारत सरकार के अधीन लाभ या विश्वास के किसी पद को धारण करते हुए किसी विदेशी राज्य से बिना राष्ट्रपति की अनुमति के कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकते।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास और कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, मुगल कालीन प्रशासनिक व्यवस्था, भू-राजस्व प्रणालियों तथा मनसबदारी व्यवस्था के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मुगल प्रशासनिक व्यवस्था में 'जात' और 'सवार' पद मनसबदारी व्यवस्था के अभिन्न अंग थे, जहाँ 'जात' मनसबदार के व्यक्तिगत वेतन और उसकी पदानुक्रमित स्थिति (Rank) को निर्धारित करता था, जबकि 'सवार' पद उसे अपने अधीन रखने वाले घोड़ों और घुड़सवार सैनिकों की संख्या को दर्शाता था।
2. राजा टोडरमल द्वारा प्रारंभ की गई 'दहसाला व्यवस्था' (Zabt System) के अंतर्गत पिछले दस वर्षों के दौरान विभिन्न फसलों के औसत उत्पादन और उनके औसत प्रचलित बाजार मूल्यों का विश्लेषण करके राजस्व का निर्धारण किया जाता था, और यह प्रणाली मुख्य रूप से बंगाल और उड़ीसा के संपूर्ण क्षेत्रों में कड़ाई से लागू की गई थी।
3. मुगलकालीन राजस्व व्यवस्था में 'पलाज' वह भूमि होती थी जिस पर वर्ष में लगातार दो बार फसलें उगाई जाती थीं और उसे कभी भी खाली (परती) नहीं छोड़ा जाता था, जबकि 'बंजर' वह उपजाऊ भूमि थी जिस पर पाँच या उससे अधिक वर्षों तक खेती नहीं की जाती थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता संरक्षण के संदर्भ में, भारत में 'अनुसूचित जातियों और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' (Forest Rights Act, 2006) के प्रावधानों और इसके क्रियान्वयन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के तहत 'वन अधिकार समिति' (Forest Rights Committee - FRC) का गठन ग्राम स्तर पर किया जाता है, जो ग्राम सभा (Gram Sabha) की एक उप-समिति होती है, और यह समिति व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) तथा सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) के दावों का प्रारंभिक सत्यापन कर उन्हें ग्राम सभा के समक्ष अनुमोदन के लिए प्रस्तुत करती है।
2. अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत पारंपरिक वनवासियों को न केवल अपने आवास और खेती के लिए भूमि का अधिकार प्रदान किया गया है, बल्कि उन्हें गौण वनोपज (Minor Forest Produce - MFP) के स्वामित्व, उपयोग और इसके विपणन का अधिकार तथा सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, पुनर्जनन या प्रबंधन का अधिकार भी कानूनी रूप से दिया गया है।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'ऑल इंडिया वनवासी समाज बनाम संघ राज्य क्षेत्र' तथा अन्य मामलों में दिए गए निर्णयों के अनुसार, इस अधिनियम के अंतर्गत वन अधिकारों के दावों की अस्वीकृति या अपील की प्रक्रिया में राज्य सरकार के वन विभाग (Forest Department) को अंतिम निर्णय लेने की अनन्य विधिक शक्ति प्राप्त है, और ग्राम सभा के निर्णय इस मामले में अंतिम नहीं होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'सार्वभौमिक बुनियादी आय' (Universal Basic Income - UBI) की अवधारणा और इसके प्रभावों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सार्वभौमिक बुनियादी आय एक ऐसी सामाजिक कल्याणकारी अवधारणा है जिसमें बिना किसी पूर्व शर्त, कार्य की बाध्यता या साधन-परीक्षण (Means-testing) के, देश के प्रत्येक नागरिक को एक निश्चित अंतराल पर नियमित रूप से नकद हस्तांतरण (Cash Transfer) प्रदान किया जाता है।
2. आर्थिक सर्वेक्षण (2016-17) में UBI को भारत में पारंपरिक लक्षित सब्सिडी प्रणालियों के एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि यह गरीबी उन्मूलन में अधिक प्रभावी हो सकता है और इससे लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) या उर्वरक सब्सिडी में होने वाले प्रशासनिक रिसाव (Leakage) को समाप्त किया जा सकता है।
3. UBI के समर्थकों का यह मुख्य दृष्टिकोण रहता है कि यह महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सौदेबाजी की शक्ति में सुधार करता है, किंतु आलोचकों का मानना है कि इसके कार्यान्वयन से श्रम आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव (Adverse Labour Supply Effects) पड़ सकता है और इसके कारण उत्पन्न होने वाला भारी राजकोषीय बोझ देश के स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उत्पादक सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण को गंभीर रूप से बाधित कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास और कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, प्राचीन भारतीय इतिहास में प्रयुक्त होने वाली 'शिल्प और आर्थिक शब्दावली' से संबंधित निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. श्रेणि (Shreni): यह प्राचीन भारत में व्यापारियों, शिल्पकारों और कारीगरों का एक निगम या संघ (Guild) होता था, जो अपने सदस्यों के लिए उत्पादन के नियम, मूल्य निर्धारण और मजदूरी तय करता था तथा जिसे अपनी निजी सेना रखने और अपने नियमों के तहत न्याय करने का अधिकार भी प्राप्त था।
2. सार्थवाह (Sarthavaha): यह प्राचीन काल में लंबी दूरी के व्यापारिक काफिलों का प्रमुख या नेता होता था, जो जोखिम भरे मार्गों से होकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक वस्तुओं का क्रय-विक्रय करने वाले व्यापारियों के समूह का नेतृत्व करता था।
3. विष्टि (Vishti): यह गुप्त औरोत्तर काल में प्रचलित एक प्रकार का कर (Tax) था, जिसके अंतर्गत राज्य द्वारा किसानों और कामगारों से बिना किसी पारिश्रमिक या मजदूरी के जबरन श्रम (Forced Labour / Begar) कराया जाता था।
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
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