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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत संविधान संशोधन की प्रक्रिया और 'न्यायिक समीक्षा' (Judicial Review) के बीच अंतःक्रिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी उपबंध को जोड़ने, संशोधित करने या निरूपित करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु इसमें यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि संविधान संशोधन विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पेश करने से पहले राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Recommendation) लेना अनिवार्य है।
  2. 2. ऐतिहासिक 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' मामले के पश्चात, सर्वोच्च न्यायालय ने 'एस.आर. बोम्मय मामले (1994)' और 'एल. चंद्रकुमार मामले (1997)' में यह स्थापित किया कि संविधान का 'मूल ढांचा' (Basic Structure) संसद की संशोधन शक्ति पर एक अंतर्निहित सीमा (Implied Limitation) है, और यदि संसद कोई ऐसा संविधान संशोधन अधिनियम पारित करती है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता या न्यायिक समीक्षा के अधिकार को समाप्त करता है, तो उसे असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है।
  3. 3. 'नवे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम' को चुनौती देने वाले 'चौथे न्यायाधीश मामले (Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India, 2015)' में सर्वोच्च न्यायालय ने 99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Recommendation) की आवश्यकता नहीं होती है। हालांकि, यदि संविधान संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है, तो राष्ट्रपति को इस पर अपनी सहमति देनी ही होती है (24वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा इसे अनिवार्य किया गया था), लेकिन शुरुआती चरण में पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है। कथन 2 सही है। केशवानंद भारती मामले (1973) में 'मूल ढांचे' का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था। बाद के मामलों जैसे एस.आर. बोम्मय (1994) और एल. चंद्रकुमार (1997) में यह स्पष्ट किया गया कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) संविधान के मूल ढांचे का एक अनिवार्य हिस्सा है, और इसे संसद द्वारा भी समाप्त नहीं किया जा सकता। कथन 3 सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 के 'चौथे न्यायाधीश मामले' (NJAC मामला) में 99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था, क्योंकि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित कर रहा था जो कि संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न अंग है।
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