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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 123' के अंतर्गत राष्ट्रपति की 'ध्यादेश जारी करने की शक्ति' (Ordinance-making Power) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रपति की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति संसद की कानून बनाने की शक्ति के सह-विस्तार (Co-extensive) है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति केवल उन्हीं विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिन पर संसद कानून बनाने की शक्ति रखती है।
- 2. ऐतिहासिक 'कुशल सिंह बनाम बिहार राज्य' मामले और अन्य संवैधानिक निर्णयों के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर होता है, क्योंकि यह कार्यपालिका के सर्वोच्च प्राधिकारी द्वारा लिया गया एक नीतिगत निर्णय है।
- 3. संसद के पुनः समवेत होने पर प्रत्येक अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखना अनिवार्य है, और यदि संसद इसे बिना किसी अनुमोदन के छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पहले अस्वीकार कर देती है, तो अध्यादेश तुरंत प्रभाव से निष्प्रभावी हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार, राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति संसद की विधि निर्माण की शक्ति के सह-विस्तार (Co-extensive) है। अर्थात, राष्ट्रपति केवल उन्हीं विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिन पर संसद कानून बना सकती है और अध्यादेश की संवैधानिक सीमाएं भी संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के समान ही होती हैं।
कथन 2 गलत है: ऐतिहासिक 'S.C. मल्लिक मामला' और विशेष रूप से 'D.C. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह निर्धारित किया है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने की शक्ति न्यायिक समीक्षा के अधीन (Subject to Judicial Review) है। यदि अध्यादेश का promulgation दुर्भावनापूर्ण ढंग से या बिना किसी तात्कालिक आवश्यकता के बार-बार किया जाता है (जैसे अध्यादेश राज का अभ्यास), तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
कथन 3 सही है: संविधान के अनुसार, संसद के पुनः समवेत होने पर अध्यादेश को दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना चाहिए। यदि संसद के दोनों सदन इसे अस्वीकार करने वाला संकल्प पारित कर देते हैं या यदि सदन दोबारा बैठने के बाद छह सप्ताह की अवधि बीत जाती है और कोई अनुमोदन नहीं होता है, अथवा यदि दोनों सदन छह सप्ताह की अवधि से पहले ही उसका अनुमोदन करने से मना कर देते हैं, तो अध्यादेश निष्प्रभावी हो जाता है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' (पंचायतों - अनुच्छेद 243 से 243-O) और '73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में 'भाग IX' और 'ग्यारहवीं अनुसूची' जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों की शक्तियों, प्राधिकारों और उत्तरदायित्वों से संबंधित कुल 29 कार्यात्मक मदें (Functional items) शामिल हैं।
2. इस अधिनियम के तहत प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली की स्थापना का प्रावधान किया गया है, किंतु जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, उन्हें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन न करने की छूट दी गई है।
3. पंचायतों के सभी स्तरों पर अध्यक्ष (Chairperson) के पदों के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के वास्ते आरक्षण का प्रावधान किया गया है, तथा महिलाओं के लिए सभी स्तरों पर कुल सीटों और अध्यक्षों के पदों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई (33%) से कम न होने वाला आरक्षण अनिवार्य किया गया है, जिसमें एससी/एसटी महिलाओं के लिए उप-आरक्षण भी शामिल है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' (संघ - अनुच्छेद 52 से 151) तथा 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General for India - अनुच्छेद 76) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति को की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित (Qualified) है, तथा संविधान में महान्यायवादी के लिए कोई निश्चित कार्यकाल निर्धारित नहीं किया गया है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) पद धारण करता है।
2. भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों और संसद की किसी भी समिति (जिसका वह सदस्य नामित किया गया हो) में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
3. महान्यायवादी भारत सरकार का पूर्णकालिक विधि अधिकारी (Full-time legal officer) होता है, और संविधान के नियमों के अनुसार वह किसी भी निजी कानूनी प्रैक्टिस या मुक़दमे में सरकार के विरुद्ध पैरवी नहीं कर सकता है, क्योंकि यह उसके पेशेवर आचरण के विरुद्ध एक सांविधिक प्रतिबंध है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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