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भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में, वर्ष 1920-1922 के दौरान चलाए गए 'असहयोग आंदोलन' (Non-Cooperation Movement) और इसके विभिन्न आयामों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के आह्वान पर देश भर में सरकारी उपाधियों, अवैतनिक पदों और सरकारी तथा अर्ध-सरकारी निकायों की सदस्यता का बड़े पैमाने पर त्याग किया गया, तथा वकीलों द्वारा अदालतों का बहिष्कार किया गया।
- 2. इस आंदोलन के आर्थिक बहिष्कार के तहत विदेशी कपड़ों का बड़े पैमाने पर जलाया जाना और उसका बहिष्कार करना एक अत्यंत प्रभावी हथियार बना, जिससे भारत के औपनिवेशिक बाजार में ब्रिटिश वस्त्रों के आयात में भारी गिरावट दर्ज की गई।
- 3. यद्यपि असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम में विधान परिषदों (Legislative Councils) के चुनाव का बहिष्कार करना शामिल था, किंतु देश के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता चित्तरंजन दास (C.R. Das) ने इस बहिष्कार का पूर्ण समर्थन किया और उनके नेतृत्व में ही बाद में 'स्वराज पार्टी' का गठन किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी उपाधियों और सम्मानों का त्याग किया गया, सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का वकीलों और छात्रों द्वारा बहिष्कार किया गया।
कथन 2 सही है: विदेशी कपड़ों का बहिष्कार और उन्हें सार्वजनिक रूप से जलाया जाना इस आंदोलन का एक प्रमुख आर्थिक हथियार था, जिससे ब्रिटिश वस्त्र निर्माताओं को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी और भारत में विदेशी कपड़ों का आयात काफ़ी कम हो गया।
कथन 3 गलत है: यद्यपि असहयोग आंदोलन के दौरान 1920 के विधान परिषदों के चुनावों का बहिष्कार किया गया था, किंतु चित्तरंजन दास (C.R. Das) ने विधान परिषदों के बहिष्कार के मुद्दे पर असहयोग आंदोलन के प्रारंभिक चरण में कांग्रेस के भीतर मतभेद रखा था। हालाँकि, बाद में जब आंदोलन स्थगित हो गया, तब चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने 1923 में 'काउंसिल प्रवेश' (Council Entry) की नीति के समर्थन में 'स्वराज पार्टी' की स्थापना की थी, न कि परिषदों के बहिष्कार के लिए। अतः कथन 3 में यह कहना कि उन्होंने बहिष्कार का पूर्ण समर्थन किया और उसी के तहत स्वराज पार्टी बनाई, तथ्यात्मक रूप से भ्रामक है क्योंकि स्वराज पार्टी ने परिषदों के भीतर जाकर सरकार को बाधित करने का मार्ग चुना था।
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भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1920-1922 के दौरान चलाए गए 'असहयोग आंदोलन' (Non-Cooperation Movement) और उससे जुड़े घटनाक्रमों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) में कांग्रेस के असहयोग कार्यक्रम के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से अनुमोदित किया गया, तथा इसी अधिवेशन में कांग्रेस के संगठन में महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हुए भाषाई आधार पर प्रांतीय कांग्रेस समितियों के पुनर्गठन और कार्य समिति (Working Committee) के गठन का प्रावधान किया गया।
2. असहयोग आंदोलन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों और श्रमिकों द्वारा भी आंदोलन चलाए गए, जिसके तहत अवध में 'इकान आंदोलन' (Eka Movement) और असम में चाय बागान के मजदूरों की हड़ताल (जिसे 'इमाम अली स्ट्राइक' भी कहा जाता है) सीधे तौर पर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश और प्रत्यक्ष नियंत्रण के तहत संचालित किए गए थे।
3. फरवरी 1922 में गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा की घटना के पश्चात महात्मा गांधी ने बारडोली में कांग्रेस की कार्य समिति की बैठक बुलाकर असहयोग आंदोलन को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने की घोषणा कर दी, जिसके कारण देश के कई अन्य युवा नेताओं (जैसे सुभाष चंद्र बोस और चित्तरंजन दास) ने इस निर्णय की तीव्र आलोचना की।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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सिक्किम राज्य में फंसे पर्यटकों को निकालने के लिए ऑपरेशन हिम सेतु किसने शुरू किया?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XX' के अंतर्गत 'संविधान का संशोधन' (Amendment of the Constitution - अनुच्छेद 368) की प्रक्रिया के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की पहल संसद के किसी भी सदन में केवल एक मंत्री या एक निजी सदस्य द्वारा पुरःस्थापित (Introduce) किए जाने वाले विधेयक के माध्यम से की जा सकती है, जिसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेना अनिवार्य होता है।
2. कुछ विशिष्ट प्रावधानों, जैसे कि राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया या राज्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित मामलों में संशोधन के लिए न केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है, बल्कि कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से उसका अनुसमर्थन (Ratification) प्राप्त करना भी अनिवार्य है।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में यह प्रतिपादित किया गया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, और संसद 'संविधान की मूल संरचना' (Basic Structure) में भी संशोधन कर सकती है बशर्ते वह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, प्राचीन भारतीय दर्शन प्रणालियों (षड् दर्शन) और उनके प्रवर्तकों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सांख्य दर्शन के प्रवर्तक ऋषि कपिल थे, जो यह मानते हैं कि इस जगत की उत्पत्ति ईश्वर की इच्छा से नहीं बल्कि प्रकृति और पुरुष के संयोग से होती है, तथा यह दर्शन पुनर्जन्म और मोक्ष के सिद्धांत को स्वीकार करता है किंतु वेदों की प्रामाणिकता को अंतिम सत्य नहीं मानता।
2. वैशेषिक दर्शन के प्रतिपादक ऋषि कणाद थे, जो भौतिकी और परमाणुवाद (Atomic Theory) के अध्ययन के लिए जाने जाते हैं, और इस दर्शन के अनुसार ब्रह्मांड के सभी भौतिक पदार्थ पाँच महाभूतों से मिलकर बने हैं जिन्हें अत्यंत सूक्ष्म और अविभाज्य परमाणुओं में विभाजित किया जा सकता है।
3. उत्तर मीमांसा या वेदांत दर्शन के संस्थापक बादरायण (व्याय व्यास) थे, जो उपनिषदों के आधार पर ब्रह्म को जगत का मूल कारण मानते हैं, और इस दर्शन प्रणाली ने आगे चलकर अद्वैत, विशिष्ठाद्वैत और द्वैत जैसी विभिन्न दार्शनिक धाराओं को जन्म दिया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' और 'संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XX के अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी उपबंध का संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु इस प्रक्रिया के तहत संसद संविधान की किसी भी मूल विशेषता या मूल संरचना को निरस्त या नष्ट नहीं कर सकती है।
2. कुछ विशिष्ट संविधान संशोधनों (जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया, केंद्र और राज्यों की कार्यकारी शक्तियों का विस्तार, या सातवीं अनुसूची की कोई सूची) के लिए संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत के साथ-साथ देश के कुल राज्यों में से कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification) का होना अनिवार्य होता है।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति की कोई सीमा नहीं है और संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से को पूरी तरह से समाप्त कर सकती है, जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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