त्वरित लिंक्स
Civil services
1 views
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 148' से 'अनुच्छेद 151' के अंतर्गत 'भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक' (Comptroller and Auditor General of India - CAG) के पद, स्वतंत्रता और उसकी शक्तियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा की जाती है, और उसे उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए लागू होते हैं।
- 2. सीएजी (CAG) का कार्यकाल 6 वर्ष की अवधि या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है, और अपने पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य कार्यालय या पद पर पुनः नियुक्ति का पात्र होता है।
- 3. सीएजी (CAG) न केवल केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के समेकित फंड (Consolidated Funds) से होने वाले सभी खर्चों की लेखा-परीक्षा करता है, बल्कि केंद्र और राज्यों के उन सभी स्वायत्त निकायों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) की भी अनिवार्य रूप से लेखा-परीक्षा करता है जिनके वित्तीय मामलों की जांच संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा विधिवत अधिकृत की गई हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 के अनुसार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उसे उसके पद से केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव के माध्यम से ही हटाया जा सकता है, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है।
कथन 2 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 148(4) के अनुसार, सीएजी (CAG) अपने पद पर रहने के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य पद पर पुनः नियुक्ति का पात्र (Ineligible) नहीं होता है। यह प्रावधान उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।
कथन 3 गलत है: सीएजी (CAG) केंद्र और राज्य सरकारों के समेकित कोष, लोक लेखे और आकस्मिकता निधि के सभी व्ययों की लेखा-परीक्षा करता है; हालाँकि, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और स्वायत्त निकायों के मामलों में, सीएजी हमेशा उनकी प्रारंभिक या एकमात्र लेखा-परीक्षा नहीं करता है क्योंकि कई मामलों में निजी चार्टर्ड अकाउंटेंट (Auditors) ऑडिट करते हैं और सीएजी केवल अनुपूरक (Supplementary) या परीक्षण लेखा-परीक्षा (Test Audit) करता है, तथा संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा विधिवत अधिकृत होने की शर्त सभी निकायों पर एक समान रूप से लागू नहीं होती। इसलिए कथन 3 तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। अत: केवल कथन 1 सही है।
Related Questions
→
भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal - NGT) अधिनियम, 2012' के प्रावधानों तथा उसकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के तहत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन तथा मुकदमों के त्वरित निपटान के लिए की गई थी, और यह भारत का ऐसा पहला विशेष निकाय है जिसने पर्यावरण संबंधी मामलों में 'प्रदूषक भुगतान करेगा' (Polluter Pays Principle) और 'सतर्कता सिद्धांत' (Precautionary Principle) को सांविधिक मान्यता दी है।
2. अधिकरण के पास यह वैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वह अपने समक्ष आने वाले मामलों की सुनवाई करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के सख्त न्यायिक नियमों और प्रक्रियाओं से पूरी तरह बंधा हुआ नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में अपील केवल 90 दिनों की अवधि के भीतर की जा सकती है, और अधिकरण के निर्णयों को उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) के अंतर्गत चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013' (National Food Security Act - NFSA) के प्रावधानों और उसकी विशेषताओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अधिनियम देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या (ग्रामीण क्षेत्रों के 75% और शहरी क्षेत्रों के 50%) को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से रियायती दरों पर खाद्यान्न प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत पात्र व्यक्तियों को चावल, गेहूं और मोटे अनाज क्रमशः 3, 2 और 1 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से प्रदान किए जाते हैं।
2. अधिनियम के प्रावधानों के तहत पात्र परिवारों की प्रत्येक वयस्क महिला (जो 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की हो) को परिवार का मुखिया माना जाएगा, ताकि उसके नाम पर राशन कार्ड जारी किया जा सके और महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जा सके।
3. यदि किसी पात्र परिवार को अधिनियम के तहत खाद्यान्न या कूपन प्राप्त नहीं होता है, तो ऐसी स्थिति में केंद्र या राज्य सरकार द्वारा प्रभावित व्यक्तियों को 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' (Food Security Allowance) का भुगतान किया जाना अनिवार्य है, जिसके निर्धारण और वितरण का पूरा अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है, राज्य सरकारों की इसमें कोई वित्तीय या प्रशासनिक भूमिका नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारत की सबसे लंबी नदी, जो केवल भारत में ही बहती है, कौन-सी है?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 355' (Article 355) के प्रावधानों और इसके संवैधानिक निहितार्थों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 355 के अंतर्गत यह संघ (Union) का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक राज्य की बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से रक्षा करे तथा यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार ही चलाई जा रही है।
2. यदि कोई राज्य सरकार केंद्र द्वारा दिए गए किसी भी कार्यकारी निर्देश (Executive Direction) का पालन करने में विफल रहती है, तो केंद्र सरकार सीधे अनुच्छेद 355 के तहत उस राज्य में राष्ट्रपति शासन (Article 356) लागू कर सकती है, जिसके लिए किसी अन्य प्रक्रिया या चेतावनी की आवश्यकता नहीं होती है।
3. अनुच्छेद 355 केवल एक सैद्धांतिक घोषणा है और इसका कोई भी न्यायोचित (Justiciable) या प्रवर्तनीय संवैधानिक प्रभाव नहीं है, क्योंकि इसके अनुपालन न होने पर राज्य उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' और 'अनुच्छेद 226' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, जबकि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता का दायरा व्यापक है क्योंकि वे मूल अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ किसी अन्य विधिक या सामान्य उद्देश्य के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं।
2. सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का प्रादेशिक क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) पूरे भारत पर विस्तृत है, जबकि किसी उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का क्षेत्र सामान्यतः केवल उसी राज्य तक सीमित होता है जिसके अधिकार क्षेत्र के भीतर वह उच्च न्यायालय स्थित है, सिવાય इसके कि वह विवादित प्राधिकारी उस उच्च न्यायालय के प्रादेशिक क्षेत्र के बाहर स्थित हो।
3. अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मूल अधिकार है (जिसके अंतर्गत संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्राप्त है), इसलिए सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में रिट जारी करने से अपनी अधिकारिता का अभाव (Want of jurisdiction) बताकर इंकार नहीं कर सकता, जबकि उच्च न्यायालय के समक्ष अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल करना एक विवेकाधीन (Discretionary) उपाय है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.