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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत 'भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) के प्रावधानों और उनकी सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति का विस्तार उन सभी मामलों पर होता है जहाँ दंड या दंडादेश ऐसे विषय के विरुद्ध किसी विधि के तहत दिया गया है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किंतु सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में राष्ट्रपति के पास क्षमादान की कोई शक्ति नहीं होती है।
  2. 2. राष्ट्रपति द्वारा किसी भी मामले में मृत्युदंड (Death Sentence) को माफ करने, उसका लघुकरण करने या उसका परिहार करने की शक्ति का प्रयोग करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) की सलाह से बाध्य होना अनिवार्य होता है, और राष्ट्रपति व्यक्तिगत विवेक (Individual Discretion) के आधार पर इस शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुसार, राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72 के तहत) न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूर्णतः बाहर है, और न्यायालय किसी भी परिस्थिति में राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान याचिका को अस्वीकार किए जाने के निर्णय की वैधता की जांच नहीं कर सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का विस्तार तीन प्रमुख क्षेत्रों पर होता है: (क) वे सभी मामले जिनमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय के विरुद्ध किसी विधि के तहत दिया गया है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है; (ख) सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दिए गए सभी मामलों में दंड या दंडादेश; तथा (ग) वे सभी मामले जिनमें दंड मृत्युदंड (Death Sentence) होता है। अतः सैन्य न्यायालयों के मामलों में भी राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्राप्त है। कथन 2 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है, किंतु क्षमादान याचिकाओं के निस्तारण में राष्ट्रपति की सहायता के लिए गृह मंत्रालय के माध्यम से केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह दी जाती है, परंतु न्यायिक व्याख्याओं और परंपराओं के अनुसार राष्ट्रपति कुछ विशेष और दुर्लभ मामलों में (जैसे दया याचिका पर पुनर्विचार या विलंब के आधार पर) अपनी विशेष संवैधानिक स्थिति का प्रभाव डालता है, और मंत्रिमंडल की सलाह को सामान्य अर्थों में पूर्णतः अविवेकी नहीं माना जाता है, हालांकि व्यावहारिक रूप से वह सरकार की सलाह से कार्य करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट (जैसे ईपुरा कृष्ण राव मामले में) यह स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रपति अपनी इस शक्ति का प्रयोग सरकार की सलाह पर करता है। कथन 3 गलत है: सर्वोच्च न्यायालय (विशेषकर *ईपुरा कृष्ण राव बनाम केंद्र सरकार* और *केहर सिंह मामले* में) यह स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72) न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं है। यदि राष्ट्रपति का निर्णय या क्षमादान याचिका को अस्वीकार करने का आदेश मनमाना (Arbitrary), दुर्भावनापूर्ण (Mala fide), या भेदभावपूर्ण (Discriminatory) पाया जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
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