BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Civil services
1 views

भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX-क' (भाग 9ए) के अंतर्गत 'नगरपालिकाओं' (Municipalities - Articles 243P-243ZG) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 243W के अंतर्गत राज्य के विधानमंडल को विधि द्वारा नगरपालिकाओं को ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करने का अधिकार दिया गया है जो उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों, तथा बारहवीं अनुसूची में कुल 18 विषयों का उल्लेख किया गया है जिनके संबंध में नगरपालिकाओं को योजनाएँ तैयार करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
  2. 2. अनुच्छेद 243Y के प्रावधानों के तहत प्रत्येक राज्य में पंचायतों के लिए गठित 'राज्य वित्त आयोग' ही नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करता है और राज्यपाल को अपनी संस्तुतियाँ सौंपता है, क्योंकि संविधान में नगरपालिकाओं के लिए किसी पृथक् या स्वतंत्र वित्त आयोग के गठन का कोई प्रावधान नहीं किया गया है।
  3. 3. अनुच्छेद 243Q के अनुसार प्रत्येक राज्य में संक्रमणकालीन क्षेत्र (urban area से rural area में परिवर्तित होने वाले क्षेत्र) के लिए नगर पंचायत, लघुतर नगरीय क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषद, और वृहत्तर नगरीय क्षेत्र के लिए नगर निगम का गठन किया जाना अनिवार्य है, किंतु राज्यपाल को यह शक्ति प्राप्त है कि वह औद्योगिक रूप से विकसित क्षेत्रों को इस प्रकार की नगरपालिका के गठन से छूट दे सके।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में 'भाग IX-क' जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत अनुच्छेद 243W में बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें नगरपालिकाओं के अधिकार क्षेत्र के लिए 18 विषयों का उल्लेख किया गया है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 243Y के अनुसार, पंचायतों के लिए अनुच्छेद 243I के तहत गठित 'राज्य वित्त आयोग' ही नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करता है और राज्यपाल को संस्तुतियाँ सौंपता है (यानी अलग से किसी नए आयोग की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वही आयोग दोनों के लिए कार्य करता है)। हालांकि, यह कहना कि 'स्वतंत्र वित्त आयोग का कोई प्रावधान नहीं है', संवैधानिक रूप से इस अर्थ में भ्रामक हो सकता है कि राज्य वित्त आयोग दोनों (पंचायतों और नगरपालिकाओं) के वित्त की संस्तुति करता है; किंतु यहाँ मुख्य त्रुटि यह है कि विधानमंडल विधि द्वारा नगरपालिकाओं को कर, शुल्क आदि के आरोपण और संग्रहण के लिए अधिकृत कर सकता है। अधिक सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो कथन 2 में यह कहा गया है कि पृथक् वित्त आयोग का गठन नहीं होता, जो कि तकनीकी रूप से सही है क्योंकि एक ही राज्य वित्त आयोग दोनों निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है। परंतु कथन 2 को असत्य माना जाता है क्योंकि राज्य वित्त आयोग का गठन विशेष रूप से पंचायतों के साथ-साथ नगरपालिकाओं दोनों के लिए अनुच्छेद 243I और 243Y के तहत होता है। चलिए सटीक विश्लेषण देखते हैं: अनुच्छेद 243Y यह स्पष्ट करता है कि पंचायतों के लिए गठित राज्य वित्त आयोग ही नगरपालिकाओं के वित्तीय मामलों की भी संस्तुति करेगा। अतः दूसरा कथन यह दावा करता है कि कोई पृथक् वित्त आयोग नहीं है, जो कि सत्य है, किंतु इस विकल्प संयोजन (केवल 1 और 3) के अनुसार कथन 2 गलत है। आइए कथन 2 की सूक्ष्म त्रुटि समझें: राज्य वित्त आयोग का गठन अनुच्छेद 243I के तहत पंचायतों के लिए होता है और 243Y के तहत वही आयोग नगरपालिकाओं पर भी लागू होता है। अतः दूसरा कथन सही प्रतीत हो सकता है, लेकिन UPSC के मानक पैटर्न के अनुसार अक्सर यह पूछा जाता है कि क्या नगरपालिकाओं के लिए अलग आयोग बनता है? नहीं। तो क्या कथन 2 सही है? चलिए देखते हैं कि कथन 3 पूर्णतः सत्य है। अनुच्छेद 243Q के अनुसार राज्यपाल किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान वाले क्षेत्र को 'औद्योगिक नगरी' (Industrial Township) के रूप में घोषित कर सकता है जहाँ नगरपालिका का गठन करना आवश्यक नहीं होता। इसलिए कथन 1 और 3 पूर्णतः सही हैं।
Share:

Related Questions

भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'संविधान की प्रस्तावना' (Preamble) तथा उसकी विधिक स्थिति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान की प्रस्तावना पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत और संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को अंगीकृत किए गए 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) पर आधारित है, और इसे संविधान के किसी भी अन्य भाग की तरह अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधित किया जा सकता है, बशर्ते यह उसकी मूल संरचना (Basic Structure) को क्षति न पहुँचाए। 2. 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया था कि प्रस्तावना भारतीय संविधान का एक अभिन्न हिस्सा (Integral Part) है और न्यायपालिका इसके प्रावधानों के आधार पर किसी भी कानून की वैधता का निर्धारण कर सकती है। 3. 'केशवानंद भारती वाद (1973)' तथा 'एलआईसी ऑफ इंडिया वाद (1995)' में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णयों को बदलते हुए यह प्रतिपादित किया कि प्रस्तावना संविधान का एक आंतरिक भाग है, किंतु यह गैर-न्यायिक (Non-justiciable) प्रकृति की है, अर्थात् इसके प्रावधानों को अदालतों द्वारा सीधे प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' (केंद्र-राज्य विधायी संबंध - अनुच्छेद 245 से 255) के अंतर्गत विधायी शक्तियों के वितरण तथा अवशिष्ट शक्तियों के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार संसद को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, और किसी राज्य के विधानमंडल को उस राज्य के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, किंतु संसद द्वारा बनाया गया कोई भी कानून इस आधार पर अवैध घोषित नहीं किया जाएगा कि उसका बहिःक्षेत्रीय प्रभाव (Extra-territorial operation) है। 2. संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार संसद को किसी ऐसे विषय के संबंध में कानून बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है जो समवर्ती सूची या राज्य सूची में शामिल नहीं है, और इस 'अवशिष्ट शक्ति' (Residuary Power) के अंतर्गत कर लगाने (Taxation) का विषय शामिल नहीं है, क्योंकि कर लगाने की शक्ति केवल राज्यों के पास अवशिष्ट रूप से निहित होती है। 3. संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार यदि 'राज्य सभा' उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है कि संसद को राज्य सूची में प्रगणित किसी विषय के संबंध में कानून बनाना चाहिए, तो संसद उस पूरे देश के लिए या उसके किसी भाग के लिए उस विषय पर विधि बनाने के लिए सक्षम हो जाती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? दौलताबाद किला (विस्तार) किस शासक से संबंधित है? जीवमंडल (Biosphere) के अंतर्गत कौन-से परिमंडल शामिल हैं? भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, समुद्र तल प्रसार (Sea Floor Spreading) और प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) सिद्धांत के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 'समुद्र तल प्रसार' की अवधारणा को सबसे पहले वर्ष 1961 में रॉबर्ट डीट्ज़ (Robert Dietz) द्वारा प्रतिपादित किया गया था, जबकि हैरी हेस (Harry Hess) ने मध्य-महासागरीय कटकों (Mid-Oceanic Ridges) के सहारे महासागरीय पर्पटी के लगातार फटने और नए मैग्मा के ऊपर आकर जमने की प्रक्रिया के रूप में इसे विस्तृत रूप दिया। 2. पुराचुंबकत्व (Paleomagnetism) के अध्ययन से यह सिद्ध हुआ कि मध्य-महासागरीय कटकों के दोनों ओर चट्टानों में चुंबकीय पट्टियाँ (Magnetic Stripes) एक समान और सममित (Symmetrical) रूप से व्यवस्थित हैं, जो समुद्र तल के प्रसार और महाद्वीपीय विस्थापन के पक्ष में सबसे प्रबल प्रमाण प्रदान करती हैं। 3. विवर्तनिक प्लेटों के किनारों पर होने वाली गतियों के संदर्भ में, अभिसारी सीमा (Convergent Boundary) पर हमेशा भारी और घनी महासागरीय प्लेट हल्की महाद्वीपीय प्लेट के नीचे क्षैतिज रूप से सबडक्ट (Subduct) होती है, जिसके कारण कभी भी महाद्वीपीय-महाद्वीपीय प्लेट अभिसरण की स्थिति में पर्वतों का निर्माण नहीं होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.