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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत 'मूल अधिकार' (Fundamental Rights - Articles 12-35) और न्यायिक समीक्षा से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 13(2) के अनुसार राज्य कोई ऐसी विधि नहीं बनाएगा जो भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती है या न्यून करती है, और इस प्रकार की बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य (Void) होगी, तथा इसके अंतर्गत 'विधि' (Law) शब्द में संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए अधिनियमों के अलावा अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम और रूढ़ि या प्रथा (Custom) भी शामिल हैं।
- 2. 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, जिसके अंतर्गत वह मूल अधिकारों को भी पूर्णतः समाप्त कर सकती है क्योंकि संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ के अंतर्गत 'विधि' (Law) की परिभाषा में शामिल नहीं होता है।
- 3. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार स्वयं में एक मूल अधिकार है, और सर्वोच्च न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) नामक पाँच प्रकार की रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जबकि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण और परमादेश रिट जारी करने की ही शक्ति है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 13(2) के अनुसार राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बना सकता जो मूल अधिकारों का उल्लंघन करे और ऐसी प्रत्येक विधि उल्लंघन की सीमा तक शून्य होगी। अनुच्छेद 13(3) के तहत 'विधि' के व्यापक दायरे में अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम, विनियम, अधिसूचना और रूढ़ि या प्रथा (Custom/Usage) सभी शामिल हैं।
कथन 2 गलत है: 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही संसद की संविधान संशोधन की शक्ति को स्वीकार किया हो, लेकिन साथ ही 'संविधान के आधारभूत ढांचा (Basic Structure)' के सिद्धांत को प्रतिपादित किया और यह स्पष्ट किया कि संसद मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में ऐसा संशोधन नहीं कर सकती जो आधारभूत ढांचे को नष्ट या क्षीण करता हो। साथ ही, केशवानंद भारती वाद से पूर्व 'गोलकनाथ वाद (1967)' में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि संविधान संशोधन भी अनुच्छेद 13 के तहत 'विधि' है, जिसे बाद में 24वें संशोधन (1971) द्वारा बदला गया।
कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय रिट जारी कर सकता है (जो स्वयं एक मूल अधिकार है), और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय भी रिट जारी कर सकते हैं। किंतु उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में अधिक व्यापक है, क्योंकि उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के अतिरिक्त 'अन्य प्रयोजनों' (जैसे साधारण कानूनी अधिकारों के उल्लंघन पर) के लिए भी उपर्युक्त पाँचों प्रकार की रिट जारी कर सकते हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी करता है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV-A' के अंतर्गत 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties - अनुच्छेद 51A) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति (Swaran Singh Committee) की संस्तुति के आधार पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था, जिसके तहत प्रारंभ में कुल 10 मूल कर्तव्य थे।
2. 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान में एक नया मूल कर्तव्य जोड़ा गया, जिसके अनुसार छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच के अपने बच्चे या प्रतिपाल्य (ward) को शिक्षा के अवसर प्रदान करना माता-पिता या संरक्षक का कर्तव्य होगा।
3. मूल कर्तव्यों की प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) है, जिसका अर्थ यह है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे सीधे दंडित किया जा सकता है या प्रवर्तित कराया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 76' के अंतर्गत 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General for India) के पद और उनकी शक्तियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत का महान्यायवादी देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति को की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्ह (Qualified) हो, और संविधान ने महान्यायवादी के लिए कोई निश्चित पदाअवधि (Fixed Term) तय नहीं की है तथा वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) पद धारण करता है।
2. महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, और उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों तथा संसद की किसी भी समिति (जिसका वह सदस्य बनाया गया हो) की बैठकों में भाग लेने और बोलने का अधिकार है, किंतु उसे संसद के दोनों सदनों में किसी भी मामले पर मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
3. महान्यायवादी अपने पद पर रहते हुए एक पूर्णकालिक सरकारी कर्मचारी (Full-time government servant) की तरह कार्य करता है, जिसके कारण उसे किसी भी प्रकार के निजी विधिक अभ्यास (Private Legal Practice) से पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है और वह सरकार की अनुमति के बिना किसी भी आपराधिक या सिविल मामले में विपक्षी पक्षकार की तरफ से पैरवी नहीं कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' (Amendment of the Constitution) तथा अनुच्छेद 368 के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XX में अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद को संविधान के किसी भी उपबंध में संशोधन करने की शक्ति प्रदान की गई है, और यह संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Permission) प्राप्त करने के बाद ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
2. संविधान के कुछ विशिष्ट प्रावधानों, जैसे कि राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया या संघ और राज्यों की कार्यकारी शक्तियों का विस्तार, में संशोधन के लिए न केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (Special Majority) की आवश्यकता होती है, बल्कि देश के कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से इसका अनुसमर्थन (Ratification) किया जाना भी अनिवार्य होता है।
3. अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन करने वाली संविधान संशोधन विधेयक पर यदि संसद के दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न हो जाता है, तो संविधान के अनुच्छेद 108 के प्रावधानों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों की एक संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाई जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - DPSP - अनुच्छेद 36 से 51) तथा उनसे जुड़े संवैधानिक संशोधनों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39A के अंतर्गत 'समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता' का प्रावधान मूल संविधान में ही निहित था, जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा हटाया गया, क्योंकि यह राज्यों की वित्तीय क्षमता के बाहर था।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए खंड जोड़े गए, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39), उद्योगों के प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी (अनुच्छेद 43A), तथा पर्यावरण का संरक्षण और संवहन तथा वन एवं वन्यजीवों की रक्षा (अनुच्छेद 48A) शामिल हैं।
3. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 38 में एक नया खंड (खंड 2) जोड़ा गया, जिसके अनुसार राज्य को विशेष रूप से आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को कम करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 110' के अंतर्गत 'धन विधेयक' (Money Bill) की परिभाषा और उसकी विधायी प्रक्रिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार, कोई विधेयक केवल तभी धन विधेयक माना जाएगा जब उसमें कर लगाने, सरकार द्वारा धन उधार लेने, भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि से धन जमा करने या निकालने से संबंधित सभी या कोई विशिष्ट प्रावधान शामिल हों।
2. लोकसभा के अध्यक्ष (Speaker) का यह निर्णय अंतिम होता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, और उसके इस निर्णय को किसी भी न्यायालय में, संसद के किसी भी सदन में या राष्ट्रपति के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती है।
3. धन विधेयक को राज्यसभा में पुनः स्थापित (Introduce) नहीं किया जा सकता है, और राज्यसभा को इसे पारित करने या अपनी सिफारिशें देने के लिए अधिकतम 30 दिनों की समयावधि प्राप्त होती है, जिसके भीतर यदि राज्यसभा इसे वापस नहीं करती है, तो विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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