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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (DPSP - अनुच्छेद 36 से 51) और उनके वर्गीकरण तथा प्रभावों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. हालांकि संविधान में DPSP को स्पष्ट रूप से विभिन्न विचारधाराओं (जैसे समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक) में वर्गीकृत नहीं किया गया है, तथापि उनके प्रावधानों के आधार पर अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का संगठन) और अनुच्छेद 43 (कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन) जैसी व्यवस्थाएं गांधीवादी विचारधारा के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार, नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मौलिक हैं और देश के लिए कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, तथा यदि राज्य इनका उल्लंघन करता है, तो किसी भी नागरिक द्वारा देश के उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में प्रवर्तन (Enforcement) के लिए याचिका दायर की जा सकती है।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स मामला, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान की नींव 'मौलिक अधिकारों' और 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' के बीच संतुलन की रथ के दो पहियों पर टिकी है, और मौलिक अधिकारों को DPSP पर पूर्ण प्राथमिकता दी गई है, जिससे DPSP को कभी भी प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के भाग IV में निहित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) को पाठ्यपुस्तक में स्पष्ट रूप से वर्गीकृत नहीं किया गया है, लेकिन उनके उद्देश्य और विषय-वस्तु के आधार पर उन्हें समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक सिद्धांतों में विभाजित किया जाता है। अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का संगठन), अनुच्छेद 43 (कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना), और अनुच्छेद 47 (नशीले पेय पदार्थों पर प्रतिबंध) स्पष्ट रूप से गांधीवादी विचारधारा को दर्शाते हैं। कथन 2 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 37 में स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि DPSP देश के शासन में मौलिक (Fundamental) हैं और कानून बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु वे **अन्यायसंगत (Non-justiciable)** हैं। इसका अर्थ यह है कि इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा उनके प्रवर्तन (Enforcement) के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, यानी इनके उल्लंघन पर अदालत में याचिका दायर नहीं की जा सकती। कथन 3 गलत है: मिनर्वा मिल्स मामला (1980) और केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) का हिस्सा हैं। हालांकि, 42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 31C में संशोधन करके कुछ नीति निर्देशक तत्वों (अनुच्छेद 39(b) और (c) से संबंधित) को अनुच्छेद 14 और 19 के मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता दी गई थी, और न्यायालय ने भी इस संतुलन को स्वीकार किया है कि DPSP को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अतः 'मौलिक अधिकारों को DPSP पर पूर्ण प्राथमिकता दी गई है और DPSP को कभी भी प्राथमिकता नहीं दी जा सकती' कथन गलत है। अतः केवल कथन 1 सही है।
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