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भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति के संदर्भ में, सल्तनत काल के दौरान 'सूफी सिलसिले' (Sufi Orders) और उनकी कार्यप्रणालियों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. सल्तनत काल में भारत में स्थापित होने वाला 'चिश्ती सिलसिला' (Chishti Silsila) अत्यधिक लोकप्रिय हुआ, जिसकी स्थापना भारत में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा अजमेर में की गई थी, और इस सिलसिले के संतों ने राज्य के संरक्षण और राजकीय पदों को स्वीकार करने की नीति का कड़ाई से पालन किया ताकि वे सुल्तानों के प्रभाव से दूर रह सकें।
- 2. 'सुहरावर्दी सिलसिला' (Suhrawardi Silsila), जिसकी स्थापना भारत में शेख बहाउद्दीन जकारिया द्वारा मुख्य रूप से सिंध और मुल्तान क्षेत्र में की गई थी, चिश्ती सिलसिले के विपरीत राजकीय संरक्षण और शाही अनुदान (Jagirs/Grants) को स्वीकार करने में संकोच नहीं करता था तथा भौतिक सुख-सुविधाओं और धन के संचय को आध्यात्मिक जीवन के बाधक के रूप में नहीं देखता था।
- 3. 'फिरदौसी सिलसिला' (Firdausi Silsila), जो सुहरावर्दी सिलसिले की ही एक शाखा थी, विशेष रूप से बिहार के क्षेत्र में अत्यंत सक्रिय रहा, और इस सिलसिले के प्रसिद्ध संत शेख बदरुद्दीन समरकंदी तथा शेख शरफद्दीन याहिया मनेरी थे, जिन्होंने जनता के बीच आध्यात्मिक मार्गदर्शन के साथ-साथ सामाजिक कल्याण के कार्यों पर भी बल दिया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि चिश्ती सिलसिले के संतों ने सुल्तानों और शासकों के साथ किसी भी प्रकार के संबंध रखने, राजकीय संरक्षण स्वीकार करने या दरबार में जाने से कड़ाई से परहेज किया (यानी वे राज्य के प्रभाव से दूर रहते थे)। इसके विपरीत, सुहरावर्दी संतों ने शाही संरक्षण स्वीकार किया था।
कथन 2 सही है, सुहरावर्दी सिलसिले के संतों (जैसे शेख बहाउद्दीन जकारिया) ने राजनीतिक सत्ता से दूरी नहीं बनाई और वे राज्य द्वारा दिए गए धन और अनुदान को स्वीकार करते थे। उनका मानना था कि एक संत के पास लोगों की सेवा करने के लिए धन का होना आवश्यक है।
कथन 3 सही है, फिरदौसी सिलसिला सुहरावर्दी सिलसिले की ही एक उप-शाखा थी जो मुख्य रूप से बिहार में फली-फूलियों। शेख शरफद्दीन याहिया मनेरी इस सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत थे, जिनके पत्र ('मक्तूबात') सूफी दर्शन में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाने वाली 'रिट अधिकारिता' (Writ Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उत्प्रेषण (Certiorari) और प्रतिषेध (Prohibition) दोनों ही न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के विरुद्ध जारी की जाने वाली रिट हैं, जिसमें मुख्य अंतर यह है कि 'प्रतिषेध' कार्यवाही को रोकने के लिए केवल तब जारी किया जाता है जब मामला विचाराधीन (Pendency) हो, जबकि 'उत्प्रेषण' अधीनस्थ न्यायालय द्वारा निर्णय दिए जाने के बाद उसके आदेश या निर्णय को रद्द करने के लिए जारी किया जाता है।
2. अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) रिट किसी सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति के अवैध दावे या दखल को रोकने के लिए जारी की जाती है, और इस रिट को दायर करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि याचिकाकर्ता स्वयं उस पद का दावेदार हो या उसके किसी मौलिक अधिकार का सीधा हनन हुआ हो, बल्कि इसे किसी भी заинтересоत (Interested) व्यक्ति द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है।
3. परमादेश (Mandamus) रिट का प्रयोग किसी भी सार्वजनिक अधिकारी, लोक निकाय, निगम, या यहाँ तक कि भारत के राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध उनके संवैधानिक या विधिक कर्तव्यों का पालन न करने की स्थिति में उनके विरुद्ध अनिवार्य रूप से जारी किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास के संदर्भ में, वर्ष 1929 के 'लाहौर अधिवेशन' और 'पूर्ण स्वराज' के प्रस्ताव के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लाहौर में आयोजित कांग्रेस के इस ऐतिहासिक अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी, और इसी अधिवेशन में पहली बार भारत के लिए 'पूर्ण स्वराज' (Complete Independence) को कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य घोषित किया गया था।
2. इस अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 का दिन 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाएगा और पूरे देश में इस दिन राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा।
3. कांग्रेस के इस अधिवेशन के तुरंत बाद, महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) की शुरुआत करने के लिए अपनी प्रसिद्ध 'ग्यारह सूत्री मांगें' (Eleven Points) वायसराय लॉर्ड इरविन के समक्ष रखीं, जिसके अस्वीकार होने पर दांडी मार्च शुरू किया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संविधान सभा द्वारा संविधान को कब अंगीकृत (Adopt) किया गया?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' और 'संविधान की संशोधन शक्ति' के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की संसद की शक्ति अनन्य और सर्वोच्च है, और अनुच्छेद 368 के तहत संसद संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है, बशर्ते वह संशोधन प्रक्रिया निर्धारित विशेष बहुमत से पारित हो।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में प्रतिपादित 'मूल ढांचा' (Basic Structure) सिद्धांत के अनुसार, संसद संविधान के 'मूल ढांचे' को प्रभावित करने वाले किसी भी प्रावधान में संशोधन नहीं कर सकती है, और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) इस मूल ढांचे का एक अभिन्न हिस्सा है।
3. संविधान के कुछ विशिष्ट प्रावधानों, जैसे कि राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया या सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से संबंधित संशोधनों के लिए, संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत के अतिरिक्त कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification) का होना भी अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'हरित बांड' (Green Bonds) और भारत में उनके नियमन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हरित बांड एक प्रकार का निश्चित आय वाला उपकरण (Fixed-income instrument) है, जिसे विशेष रूप से जलवायु-अनुकूल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक परियोजनाओं, जैसे कि अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, और संधारणीय जल प्रबंधन के वित्तपोषण के लिए पूंजी जुटाने हेतु जारी किया जाता है।
2. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 'SEBI (Issue and Listing of Non-Convertible Securities) Regulations, 2021' के अंतर्गत हरित ऋण पत्रों (Green Debt Securities) के लिए विशिष्ट दिशा-निर्देश और प्रकटीकरण मानक निर्धारित किए हैं, जिसके तहत जारीकर्ता को जुटाई गई आय के उपयोग पर स्वतंत्र तृतीय-पक्षीय प्रमाणन (Third-party certification) प्राप्त करना अनिवार्य होता है।
3. भारत सरकार द्वारा संप्रभु हरित बांड (Sovereign Green Bonds) फ्रेमवर्क के तहत जारी किए गए बांडों से प्राप्त होने वाली आय को देश के समेकित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा किया जाता है, जिसका उपयोग केंद्र सरकार के सामान्य राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए किसी भी सरकारी उद्देश्य हेतु किया जा सकता है।
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