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Civil services
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' (राज्य के नीति निदेशक तत्व - अनुच्छेद 36 से 51) के अंतर्गत उल्लिखित प्रावधानों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत राज्य को यह निर्देश दिया गया है कि वह यह सुनिश्चित करे कि विधिक तंत्र (Legal system) इस प्रकार से काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो, और विशेष रूप से आर्थिक या अन्य असमर्थताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय के अवसर से वंचित न किया जाए, जिसके क्रियान्वयन के लिए संसद ने 'विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1983' (Legal Services Authorities Act, 1983) को अधिनियमित किया था।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 40 के तहत राज्य को ग्राम पंचायतों के संगठन के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया गया है, ताकि उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान किए जा सकें, और यह निर्देशक सिद्धांत मुख्य रूप से गांधीवादी विचारधारा (Gandhian Ideology) पर आधारित है।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत राज्य, भारत के पूरे राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए 'एक समान सिविल संहिता' (Uniform Civil Code) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह सिद्धांत प्रकृति से न्यायोचित (Justiciable) है, जिसका अर्थ है कि यदि कोई राज्य इस प्रावधान को अपने क्षेत्र में लागू करने में विफल रहता है, तो देश का कोई भी नागरिक सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में सीधे रिट याचिका दायर करके इसे लागू करने का आदेश प्राप्त कर सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि 'विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम' को संसद द्वारा वर्ष 1987 में अधिनियमित किया गया था (इसे Legal Services Authorities Act, 1987 कहा जाता है), न कि 1983 में। कथन 2 सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 40 के अंतर्गत ग्राम पंचायतों का संगठन गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित एक महत्वपूर्ण नीति निदेशक तत्व है, जिसे बाद में 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से संवैधानिक दर्जा और औपचारिक रूप प्रदान किया गया। कथन 3 असत्य है क्योंकि नीति निदेशक तत्व (DPSPs) प्रकृति से 'गैर-न्यायोचित' (Non-justiciable) होते हैं, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 37 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवृत्त नहीं कराया जा सकता है। इसलिए, नागरिक इनके क्रियान्वयन के लिए न्यायालयों में रिट याचिका दायर नहीं कर सकते हैं।
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