BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
34 views

कैबिनेट मिशन कब भारत आया?

Detailed Explanation

1946।
Share:

Related Questions

→ भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 43 के अंतर्गत राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से, कृषि उद्योग या अन्य प्रकार के सभी श्रमिकों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर और अवकाश के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा, तथा इसी उद्देश्य के तहत संविधान में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 'उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी' से संबंधित अनुच्छेद 43A को भी जोड़ा गया था। 2. संविधान के अनुच्छेद 48A (पर्यावरण, वन और वन्य जीवों की रक्षा) और अनुच्छेद 48 (कृषि और पशुपालन का संगठन) दोनों को मूल संविधान में 1950 के समय ही शामिल कर लिया गया था, और इनमें से किसी भी अनुच्छेद में बाद में संविधान संशोधनों के माध्यम से कोई संशोधन या नया प्रावधान नहीं जोड़ा गया है। 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद (1973)' और 'मिनर्वा मिल्स वाद (1980)' में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे एक रथ के दो पहियों के समान हैं जो देश में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और उनसे जुड़े संवैधानिक उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 243-B के तहत प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों के गठन का प्रावधान किया गया है, किंतु जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से अधिक नहीं है, उन्हें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन न करने की छूट दी गई है। 2. अनुच्छेद 243-C के अनुसार राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, पंचायतों की संरचना के संबंध में उपबंध कर सकता है, जिसमें प्रत्येक स्तर पर पंचायतों के अध्यक्षों का निर्वाचन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राज्य के विधानमंडल द्वारा तय विधि के अनुसार हो सकता है, जबकि पंचायतों के सभी स्तरों के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाने वाले सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष विधि से ही होना अनिवार्य है। 3. अनुच्छेद 243-E के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल उनकी पहली बैठक के लिए नियत तारीख से पाँच वर्ष का होता है, और यदि किसी पंचायत को समय से पूर्व विघटित कर दिया जाता है, तो विघटन की तिथि से छह महीने की अवधि के भीतर नए चुनाव कराना अनिवार्य होता है, तथा इस प्रकार नव-गठित पंचायत केवल शेष बची हुई समयावधि (Remainder Period) के लिए ही अस्तित्व में रहती है। → भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह उपबंधित किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) की घोषणा को किसी भी न्यायालय में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा समाप्त कर दिया गया। 2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति संपूर्ण देश में या उसके किसी विशिष्ट भाग में एक साथ राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर सकता है, तथा देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग आधारों पर एक साथ एकाधिक राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणाएँ भी प्रख्यापित कर सकता है। 3. राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को संसद के प्रत्येक सदन द्वारा उसकी घोषणा की तिथि से एक महीने के भीतर विशेष बहुमत (Special Majority) द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य होता है, जिसे मूल संविधान में दो महीने रखा गया था और बाद में 44वें संशोधन द्वारा इसे घटाकर एक महीना किया गया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → संविधान सभा के गठन, उसकी कार्यप्रणाली और उद्देश्यों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. कैबिनेट मिशन योजना (1946) के प्रावधानों के तहत संविधान सभा के लिए जुलाई-अगस्त 1946 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने कुल 296 सीटों में से 208 सीटें जीती थीं, जबकि मुस्लिम लीग को केवल 73 सीटें प्राप्त हुई थीं। 2. संविधान सभा की प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का निर्वाचन मूल रूप से बंगाल प्रांत के पूर्वी भाग (जेस्सोर-खुलना क्षेत्र) से हुआ था, किंतु भारत के विभाजन के पश्चात वे बंबई प्रांत की पूना सीट से उप-चुनाव जीतकर संविधान सभा में पुनः शामिल हुए थे। 3. संविधान सभा के उद्देश्यों को स्पष्ट करने वाले 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) को पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत किया गया था, जिसे संविधान सभा द्वारा बिना किसी बहस या संशोधन के उसी दिन सर्वसम्मति से पारित कर लिया गया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया, सदनों की विशेषाधिकारिता और वित्तीय नियंत्रण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के तहत ऐसा कोई भी वित्तीय विधेयक (Financial Bill Category-I), जिसमें अनुच्छेद 110 के उपबंधों के अलावा अन्य मामले भी शामिल हैं, लोकसभा में राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, किंतु राज्यसभा इस प्रकार के विधेयक को संशोधित करने या अस्वीकृत करने का पूर्ण अधिकार रखती है। 2. अनुच्छेद 122 के अनुसार संसद की किसी भी कार्यवाही की वैधता को इस आधार पर किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है कि प्रक्रिया का कोई अनियमित पालन हुआ है, तथा संसद का कोई भी सदन या उसका सदस्य अपनी आंतरिक कार्यवाहियों के नियमन के संबंध में किसी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है। 3. लोकसभा के विघटन के पश्चात राष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108) के संदर्भ में यदि कोई साधारण विधेयक लोकसभा में लंबित था और लोकसभा विघटित हो चुकी है, तो ऐसा विधेयक व्यपगत (Lapse) नहीं होता है यदि राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुलाने की अपनी मंशा पहले ही अधिसूचित कर दी हो। 4. संसद के किसी सदन में विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) या सदन की अवमानना से संबंधित किसी मामले में यदि कोई प्रस्ताव पारित किया जाता है, तो सदन को अपने सदस्यों या बाहरी व्यक्तियों को दंडित करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु इस प्रकार के दंडात्मक आदेशों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) उच्चतम न्यायालय द्वारा किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.