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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' (मूल अधिकार) के अंतर्गत 'अनुच्छेद 21' (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर इस अनुच्छेद की व्यापक व्याख्या के माध्यम से दिए गए अधिकारों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' (Procedure Established by Law) शब्दावली को ब्रिटिश संविधान से लिया गया था, किंतु वर्ष 1978 के 'मेनका गांधी मामले' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि इस अनुच्छेद के अंतर्गत केवल विधायी प्रक्रिया की औपचारिकता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस विधि को 'विधि की उचित प्रक्रिया' (Due Process of Law) के सिद्धांतों के अनुरूप न्यायसंगत, निष्पक्ष और तार्किक भी होना चाहिए।
- 2. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy), 'त्वरित न्याय का अधिकार' (Right to Speedy Trial), 'विदेशी यात्रा का अधिकार' (Right to Go Abroad) और 'स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार' (Right to Clean Environment) को अनुच्छेद 21 के दायरे के भीतर एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है।
- 3. अनुच्छेद 21 के प्रावधान केवल भारतीय नागरिकों के लिए ही उपलब्ध हैं, विदेशी नागरिकों या शरणार्थियों के लिए नहीं, क्योंकि विदेशी नागरिकों को केवल अनुच्छेद 14 के तहत ही समानता का अधिकार प्राप्त है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' (जापानी संविधान से प्रेरित) शब्दावली का प्रयोग किया गया है, लेकिन मेनका गांधी मामले (1978) के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अमेरिकी अवधारणा 'विधि की उचित प्रक्रिया' (Due Process of Law) के तत्वों को इसमें शामिल कर लिया है, जिसके अनुसार कानून केवल प्रक्रियात्मक रूप से ही नहीं, बल्कि न्यायसंगत और उचित भी होना चाहिए। कथन 2 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी व्यापक व्याख्या (के.एस. पुट्टुस्वामी मामले सहित) के तहत निजता, त्वरित न्याय, स्वच्छ पर्यावरण और विदेश यात्रा के अधिकारों को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राप्त अधिकार (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) नागरिकों और विदेशियों (शत्रु एलियंस को छोड़कर) दोनों के लिए उपलब्ध हैं, न कि केवल भारतीय नागरिकों के लिए।
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भारतीय राजव्यवस्था के अंतर्गत 'संसदीय विशेषाधिकार' (Parliamentary Privileges - अनुच्छेद 105 और 194) तथा 'संसद सदस्यों की अयोग्यता' (Anti-Defection Law - दसवीं अनुसूची) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अनुसार, संसद के किसी भी सदस्य द्वारा सदन में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी मत के संबंध में देश के किसी भी न्यायालय में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती है, और यह उन्मुक्ति सदन के बाहर दिए गए बयानों पर भी समान रूप से लागू होती है बशर्ते वे बयान विधायी कामकाज से संबंधित हों।
2. दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के अंतर्गत किसी विधायक या सांसद को अयोग्य ठहराने का अंतिम और निर्णायक क्षेत्राधिकार केवल संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) का होता है, और पीठासीन अधिकारी द्वारा इस संदर्भ में लिए गए निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को 'किहोटो होलोहन बनाम जाचूहो (1992)' मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्णतः असंवैधानिक और वर्जित घोषित कर दिया गया है।
3. 'किहोटो होलोहन' मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुसार, पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है, सिवाय उस स्थिति के जब वह निर्णय mala fide (दुराशय), प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन या घोर अवैधता (perversity) पर आधारित हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 20' (Article 20) के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों और सुरक्षा उपायों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 20 किसी व्यक्ति को 'पूर्व-दा्र्शिक आपराधिक विधियों' (Ex-post facto criminal laws) के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को ऐसे कार्य के लिए जो किए जाने के समय अपराध नहीं था, दोषी नहीं ठहराया जा सकता और न ही उस अपराध के लिए उस समय प्रवृत्त कानून द्वारा दी जाने वाली सजा से अधिक सजा दी जा सकती है।
2. अनुच्छेद 20 के खंड (2) के तहत निहित 'दोहरे खतरे' (Double Jeopardy) के सिद्धांत के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित किया जा सकता है, बशर्ते मामला सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता हो।
3. अनुच्छेद 20 के खंड (3) के अंतर्गत किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को 'स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य' (Self-incrimination) नहीं किया जा सकता है, और यह संरक्षण न केवल आपराधिक न्यायालयों में बल्कि पुलिस हिरासत या पूछताछ के दौरान दिए गए बयानों पर भी पूरी तरह लागू होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' (पंचायतों - अनुच्छेद 243 से 243O) और 'भाग IX-A' (नगरपालिकाओं - अनुच्छेद 243P से 243ZG) के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से संविधान में क्रमशः भाग IX और IX-A जोड़े गए, जिनके तहत पंचायतों और नगरपालिकाओं दोनों के लिए महिलाओं को कुल भरी जाने वाली प्रत्यक्ष सीटों की संख्या के कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित करना अनिवार्य किया गया है, तथा यह आरक्षण अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर भी लागू होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 243-I के अनुसार प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, इस अधिनियम के प्रारंभ होने से एक वर्ष के भीतर और उसके बाद प्रत्येक पाँचवें वर्ष की समाप्ति पर, एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) का गठन करेगा, जो पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा और राज्यपाल को यह संस्तुति करेगा कि करों और शुल्कों के शुद्ध आगमों का राज्य और स्थानीय निकायों के बीच वितरण किस प्रकार किया जाना चाहिए।
3. स्थानीय निकायों के चुनावों को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से संचालित करने के लिए, संविधान के अनुच्छेद 243K के तहत प्रत्येक राज्य में एक 'राज्य निर्वाचन आयोग' (State Election Commission) के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसके राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, तथा उसे उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और आधारों पर भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को हटाया जाता है।
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