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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - अनुच्छेद 36 से 51) तथा इनके न्यायोचित (Justiciable) और गैर-न्यायोचित स्वरूप के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि नीति निर्देशक तत्वों में अंतर्विष्ट उपबंध किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (Enforceable) नहीं होंगे, किंतु फिर भी ये देश के शासन में मौलिक हैं और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।
- 2. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है कि यद्यपि नीति निर्देशक तत्व सीधे तौर पर न्यायोचित नहीं हैं, किंतु संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार करते समय तथा किसी वैधानिक प्रावधान की संवैधानिकता की जाँच करते समय न्यायालयों को 'सामंजस्यपूर्ण निर्माण के सिद्धांत' (Principle of Harmonious Construction) के तहत मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए।
- 3. भारतीय संविधान में उल्लिखित नीति निर्देशक तत्वों को पूरी तरह से ब्रिटिश संविधान के 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ इंस्ट्रक्शंस' (Instrument of Instructions) से हूबहू लिया गया है, और वर्ष 1950 में संविधान लागू होने के समय से ही इनमें पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों की रक्षा से संबंधित निर्देशक तत्व मूल रूप से शामिल थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार, नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मौलिक (Fundamental) हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, लेकिन ये किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (Non-justiciable) नहीं हैं।
कथन 2 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स मामला) में यह स्थापित किया है कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं, और न्यायालयों को इनकी व्याख्या करते समय इनके बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहिए।
कथन 3 गलत है: नीति निर्देशक तत्वों के स्रोतों में आयरिश संविधान (जो स्पेनिश संविधान से प्रभावित था) का मुख्य योगदान है। इसके अलावा, भारत सरकार अधिनियम, 1935 के 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ इंस्ट्रक्शंस' से प्रेरणा ली गई थी, न कि उन्हें हूबहू ब्रिटिश संविधान से लिया गया था। साथ ही, पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों की रक्षा से संबंधित अनुच्छेद 48-क (Article 48A) को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था।
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन' (National Infrastructure Pipeline - NIP) तथा भारत में अवसंरचना वित्तपोषण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) को वर्ष 2019 में लॉन्च किया गया था, जिसका उद्देश्य देश में विश्व स्तरीय अवसंरचना का विकास करना और सभी नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाना है, तथा इसमें केवल केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाओं को शामिल किया गया है, राज्य स्तर की परियोजनाओं को इससे पूरी तरह बाहर रखा गया है।
2. NIP के अंतर्गत ऊर्जा, सड़क, शहरी अवसंरचना, और रेलवे जैसे क्षेत्रों को सबसे अधिक पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) आवंटित किया गया है, जिसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए 'सार्वजनिक-निजी भागीदारी' (PPP) मॉडल पर विशेष बल दिया गया है।
3. भारत में दीर्घकालिक अवसंरचना वित्तपोषण की समस्या को दूर करने के लिए 'राष्ट्रीय अवसंरचना और निवेश कोष' (NIIF) की स्थापना की गई है, जो एक अर्ध-सार्वजनिक सॉवरेन वेल्थ फंड है और इसमें भारत सरकार के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों की भी हिस्सेदारी है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) और इसके न्यायिक पुनर्वलोकन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति को किसी राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य का सरकार का चलना संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है, तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा राज्य सरकार के सभी या किन्हीं कृत्यों को अपने हाथ में ले सकता है।
2. 'एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' के ऐतिहासिक मामले में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा का न्यायिक पुनर्वलोकन (Judicial Review) किया जा सकता है, और यदि उद्घोषणा माला फाइड (mala fide) या पूर्णतः अप्रासंगिक आधारों पर आधारित पाई जाती है, तो न्यायालय उस उद्घोषणा को असंवैधानिक घोषित कर सकता है तथा विघटित राज्य विधानसभा को पुनर्जीवित भी कर सकता है।
3. अनुच्छेद 356 के तहत जारी की गई राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तारीख से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, तथा यदि एक बार दोनों सदनों द्वारा इसका अनुमोदन हो जाता है, तो यह अधिकतम 3 वर्ष की अवधि तक प्रवृत्त रह सकती है, बशर्ते हर छह महीने में इसका पुनरनुमोदन संसद द्वारा किया जाता रहे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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