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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान की 'सातवीं अनुसूची' के अंतर्गत 'अवशिष्ट विधायी शक्तियों' (Residuary Legislative Powers - अनुच्छेद 248) तथा विधायी शक्तियों के वितरण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार संसद को किसी भी ऐसे विषय के संबंध में विधि बनाने की अनन्य (Exclusive) शक्ति प्राप्त है जो समवर्ती सूची या राज्य सूची में शामिल नहीं है, और इस अवशिष्ट शक्ति के अंतर्गत कर लगाने (Taxation) की शक्ति भी संसद में ही निहित है।
- 2. भारत की संघीय प्रणाली में अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और ऑस्ट्रेलिया के संविधान के मॉडल पर आधारित हैं, जहाँ ये शक्तियाँ स्पष्ट रूप से संघ सरकार के बजाय राज्यों या प्रांतों को प्रदान की गई हैं।
- 3. यदि कोई नया विषय उत्पन्न होता है जो संघ, राज्य या समवर्ती किसी भी सूची में प्रत्यक्ष रूप से प्रगणित (Enumerated) नहीं है, तो इस बात का अंतिम निर्णय लेने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय के पास है कि वह विषय किस सूची के अंतर्गत आएगा, और सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या के पश्चात ही संसद या राज्य विधानमंडल उस पर कानून बना सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार, संसद को किसी भी ऐसे विषय के संबंध में विधि बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है जो समवर्ती सूची (List III) या राज्य सूची (List II) में प्रगणित नहीं है। इसमें कर लगाने की शक्ति (Power to make laws with respect to any tax not mentioned in either List II or List III) भी शामिल है। यह व्यवस्था कनाडा के संविधान से प्रेरित है।
कथन 2 गलत है: भारत में अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ अमेरिकी (USA) या ऑस्ट्रेलियाई मॉडल पर आधारित नहीं हैं (जहाँ अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों को दी गई हैं), बल्कि यह 'कनाडा के संविधान' के मॉडल पर आधारित हैं, जहाँ अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र सरकार (संघ) को प्रदान की गई हैं।
कथन 3 गलत है: यह निर्णय लेने का अधिकार कि कोई विषय अवशिष्ट शक्तियों के अंतर्गत आता है या नहीं, अंतिम रूप से 'संसद' के पास है न कि सीधे सर्वोच्च न्यायालय के पास। सर्वोच्च न्यायालय केवल न्यायिक समीक्षा के दौरान यह परीक्षण करता है कि क्या संसद द्वारा बनाया गया कानून विधायी क्षमता के भीतर है या नहीं। यदि कोई विषय किसी भी सूची में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं है, तो अनुच्छेद 248 और प्रविष्टि 97 (संघ सूची) के तहत संसद उस पर कानून बनाने के लिए सक्षम है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत संविधान संशोधन की प्रक्रिया और इसके न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में (लोकसभा या राज्यसभा) पुरःस्थापित किया जा सकता है, किंतु इसे राज्य विधानमंडल में पेश नहीं किया जा सकता है और इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Permission) की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
2. वे संविधान संशोधन जो संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण या उच्च न्यायालयों के गठन से संबंधित हैं, उन्हें संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित किए जाने के अलावा कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification) प्राप्त होना अनिवार्य है।
3. 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' के ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, और संसद द्वारा संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) को प्रभावित करने वाले संशोधनों की भी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, सल्तनत काल और मुगल काल के दौरान प्रशासनिक शब्दावली और कृषि व्यवस्था से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सल्तनत काल में 'इक्ता प्रणाली' (Iqta System) एक प्रकार की प्रशासनिक और भू-राजस्व व्यवस्था थी, जिसके अंतर्गत सैन्य कमांडरों या अधिकारियों (जिन्हें इक्तादार या मुक्ती कहा जाता था) को राजस्व एकत्र करने के लिए भूमि के टुकड़े दिए जाते थे, तथा यह पद शुरू से ही वंशानुगत था और सुल्तान द्वारा इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं किया जाता था।
2. मुगल काल के दौरान राजा टोडरमल द्वारा शुरू की गई 'दाहसाला व्यवस्था' (Dahshala System) भू-राजस्व निर्धारण की एक प्रणाली थी, जिसके अंतर्गत पिछले दस वर्षों (10 years) के दौरान विभिन्न फसलों के औसत उत्पादन और औसत बाजार मूल्यों का अध्ययन करके कर का निर्धारण किया जाता था।
3. मुगल प्रशासन में 'पोलज' (Polaj) वह उपजाऊ भूमि होती थी जिस पर वर्ष में हर फसल के लिए लगातार खेती की जाती थी और उसे कभी भी खाली नहीं छोड़ा जाता था, जबकि 'परती' वह भूमि होती थी जिस पर उर्वरता पुनः प्राप्त करने के लिए कुछ समय के लिए खेती नहीं की जाती थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण' (NGRBA) और वर्तमान में कार्यरत 'राष्ट्रीय गंगा परिषद' (NGC) के विधिक प्रावधानों तथा शासी संरचना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(3) के प्रावधानों के तहत वर्ष 2009 में स्थापित 'राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण' (NGRBA) की अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाती थी, और इसे गंगा नदी के प्रदूषण निवारण, संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक समग्र व योजनाबद्ध दृष्टिकोण अपनाने का वैधानिक अधिकार दिया गया था।
2. वर्ष 2016 में NGRBA का अधिक्रमण (Supersession) कर दिया गया और इसके स्थान पर 'गंगा नदी (कायाकल्प, संरक्षण और प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016' के तहत 'राष्ट्रीय गंगा परिषद' (National Ganga Council - NGC) का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता भी प्रधानमंत्री करते हैं तथा इसके सदस्यों में संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होते हैं।
3. राष्ट्रीय गंगा परिषद (NGC) के प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण के सुचारू संचालन के लिए गठित 'राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन' (NMCG) को केवल एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में कार्य करना पड़ता है, और इसे विधिक रूप से 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986' के अंतर्गत कोई भी दंडात्मक या अर्द्ध-न्यायिक शक्तियां प्रदान नहीं की गई हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (NGT - National Green Tribunal) की स्थापना, अधिकार क्षेत्र और इसके कामकाज के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत की गई थी, और इसे सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत निर्धारित पारंपरिक न्यायिक प्रक्रियाओं और साक्ष्य नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है।
2. यह अधिकरण पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन, प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय क्षति से जुड़े मामलों के प्रभावी और त्वरित निस्तारण के साथ-साथ पर्यावरण पीड़ितों को राहत और मुआवजा देने का अधिकार रखता है।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार (Award) के विरुद्ध अपील सीधे सर्वोच्च न्यायालय में ही की जा सकती है, और इसके निर्णयों को चुनौती देने के लिए उच्च न्यायालयों (High Courts) की अधिकारिता पूरी तरह से वर्जित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 143' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के 'सलाहकार क्षेत्राधिकार' (Advisory Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति विधि या तथ्य के किसी ऐसे व्यापक सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर, जो उत्पन्न हो चुका है या जिसके उत्पन्न होने की संभावना है, सर्वोच्च न्यायालय की राय मांग सकता है, और सर्वोच्च न्यायालय के लिए ऐसी किसी भी बात पर राष्ट्रपति को अपनी राय देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।
2. यदि राष्ट्रपति द्वारा संविधान पूर्व संधियों, समझौतों, प्रसंविदाओं या अन्य ऐसी ही साठगाँठ से उत्पन्न किसी विवाद के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगा जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को अपनी राय देना अनिवार्य होता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सलाहकार क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दी गई राय केवल एक विधिक सलाह (Legal Advice) होती है, जो राष्ट्रपति के लिए किसी भी स्थिति में बाध्यकारी नहीं होती है, और न ही यह न्यायालय द्वारा दिया गया कोई निर्णय (Judgment) होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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